मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

मान लेते हैं हमारी हार है ...

आस्तीनों में छुपी तलवार है
और कहता है के मेरा यार है
 
गर्मियों की छुट्टियाँ भी खूब हैं
रोज़ बच्चों के लिए इतवार है
 
सच परोसा चासनी के झूठ में
छप गया तो कह रहा अख़बार है
 
चैन से जीना कहाँ आसान जब
चैन से मरना यहाँ दुश्वार है
 
दर्द में तो देख के राज़ी नहीं
यूँ जताते हैं की मुझ से प्यार है
 
खुद से लड़ने का हुनर आता नहीं  
मान लेते हैं हमारी हार है
 

22 टिप्‍पणियां:

  1. सच परोसा चासनी के झूठ में
    छप गया तो कह रहा अख़बार है

    बढ़िया व्यंग.

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 29 अक्टूबर 2020 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. वाह!.क्या बात है ,लाजवाब सृजन दिगंबर जी ।

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  4. वाहः
    खुद से लड़ने का हुनर आता नहीं
    मान लेते हैं हमारी हार है..
    –सभी अशआर सराहनीय

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  5. आस्तीनों में छुपी तलवार है
    और कहता है के मेरा यार है
    बहुत बढ़िया।

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  6. खुद से लड़ने का हुनर आता नहीं
    मान लेते हैं हमारी हार है
    हर शेर सँभालकर रखने लायक ! बहुत खूब !

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  7. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (३१-१०-२०२०) को 'शरद पूर्णिमा' (चर्चा अंक- ३८७१) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

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  8. वाह! बहुत उम्दा अस्आर सभी सार्थक कुछ कहते से।

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  9. सच परोसा चासनी के झूठ में
    छप गया तो कह रहा अख़बार है....अदभुत शब्द चुनते हैं आप !! लाजवाब 

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