सोमवार, 23 नवंबर 2020

जगमग बुलंदियों पे ही ठहरे नहीं हैं हम ...

बहला रहे हो झूठ से पगले नहीं हैं हम.
बोलो न बात जोर से बहरे नहीं हैं हम.
 
हमसे जो खेलना हो संभल कर ही खेलना,
शतरंज पे फरेब के मोहरे नहीं हैं हम.
 
सोने सी लग रही हैं ये सरसों की बालियाँ,
तो क्या है जो किसान सुनहरे नहीं हैं हम.
 
हरबार बे-वजह न घसीटो यहाँ वहाँ,   
मसरूफियत है, इश्क़ में फुकरे नहीं हैं हम.  
 
मुश्किल हमारे दिल से उभरना है डूब के, 
हैं पर समुंदरों से तो गहरे नहीं हैं हम.
 
गुमनाम बस्तियों में गुजारी है ज़िन्दगी,
जगमग बुलंदियों पे ही ठहरे नहीं हैं हम.

10 टिप्‍पणियां:

  1. सोने सी लग रही हैं ये सरसों की बालियाँ,
    तो क्या है जो किसान सुनहरे नहीं हैं हम.
    बहुत खूब कहा है.

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  2. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (25-11-2020) को   "कैसा जीवन जंजाल प्रिये"   (चर्चा अंक- 3896)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  4. मुश्किल हमारे दिल से उभरना है डूब के,
    हैं पर समुंदरों से तो गहरे नहीं हैं हम.

    गुमनाम बस्तियों में गुजारी है ज़िन्दगी,
    जगमग बुलंदियों पे ही ठहरे नहीं हैं हम.
    ......बहुत ख़ूब..।सुंदर अभिव्यक्ति..।

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  5. वाह ! बहुत खूब, बनी रहे यह मसफूरियत..

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  6. मुश्किल हमारे दिल से उभरना है डूब के,
    हैं पर समुंदरों से तो गहरे नहीं हैं हम....
    जबरदस्त 

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