बुधवार, 15 सितंबर 2021

वक़्त ने करना है तय सबका सफ़र

उम्र तारी है दरो दीवार पर.
खाँसता रहता है बिस्तर रात भर.
 
जो मिला, मिल तो गया, बस खा लिया,
अब नहीं होती है हमसे न-नुकर. 
 
सुन चहल-कदमी गुज़रती उम्र की,
वक़्त की कुछ मान कर अब तो सुधर. 
 
रात के लम्हे गुज़रते ही नहीं,
दिन गुज़र जाता है खुद से बात कर.
 
सोचता कोई तो होगा, है वहम,
कौन करता है किसी की अब फिकर.
 
था खरीदा, बिक गया तो बिक गया,
क्यों इसे कहने लगे सब अपना घर.
 
मौत की चिंता जो कर लोगे तो क्या,
वक़्त ने करना है तय सबका सफ़र.


मंगलवार, 7 सितंबर 2021

ज़रूर नाम किसी शख्स ने लिया होता

किसी हसीन के जूड़े में सज रहा होता.
खिला गुलाब कहीं पास जो पड़ा होता.
 
किसी की याद में फिर झूमता उठा होता,
किसी के प्रेम का प्याला जो गर पिया होता.
 
यकीन मानिए वो सामने खड़ा होता,
वो इक गुनाह जो हमने कहीं किया होता.
 
हर एक हाल में तन के खड़ा हुआ होता,
खुद अपने आप से मिलता कभी लड़ा होता.
 
किसी के काम कभी मैं भी आ गया होता,
दुआ के साथ मेरे हाथ जो शफ़ा होता,
 
किसी मुकाम पे मिलता कहीं रुका होता,
मेरी तलाश में घर से अगर चला होता.
 
लगाता हुस्न जो मरहम किसी के ज़ख्मों पर,
ज़रूर नाम किसी शख्स ने लिया होता.

सोमवार, 30 अगस्त 2021

चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू …

साहिल की भीगी रेत से लहरों की गुफ़्तगू.
सुन कर भी कौन सुनता है बहरों की गुफ़्तगू.

कुछ सब्ज पेड़ सुन के उदासी में खो गए,
खेतों के बीच सूखती नहरों की गुफ़्तगू.

अब आफ़ताब का भी निकलना मुहाल है,
इन बादलों से हो गई कुहरों की गुफ़्तगू.

ख़ामोशियों के पास जमा रहती हैं सभी,
फ़ुर्कत के चंद लम्हों से पहरों की गुफ़्तगू.

जंगल ने कान में है कहा गाँव के यही,
कितनी जुदा है आज भी शहरों की गुफ़्तगू.

गुमसुम सी महफ़िलों की हक़ीक़त सुनो कभी,
चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू.

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

नज़र के इशारे नकाबों ने खोले ...

न महफ़िल न किस्से न बातों ने खोले.
सभी राज़ उनकी निगाहों ने खोले.
 
शहर तीरगी के मशालों ने खोले,
कई राज़ मिल के सितारों ने खोले.
 
मुहर एक दिन सब लगा देंगें इस पर,
तरक्की के रस्ते किताबों ने खोले.
 
रहस्यों का खुलना, मेरा मानना है,
लगातार होते सवालों ने खोले.
 
अदा है के मासूमियत, क्या करें हम,
कई सच तो उनके बहानों ने खोले,
 
न जुगनू की कोशिश में कोई कमी पर,
अंधेरों के चिलमन उजालों ने खोले.
 
अदा थी, हया थी, के इश्क़े – बयाँ था,
नज़र के इशारे नकाबों ने खोले
.

शनिवार, 7 अगस्त 2021

और बच्चा बन के मैं बाहों में इतराता रहा ...

सात घोड़ों में जुता सूरज सुबह आता रहा.
धूप का भर भर कसोरा सर पे बरसाता रहा.

काग़ज़ी फूलों पे तितली उड़ रही इस दौर में,
और भँवरा भी कमल से दूर मंडराता रहा.

हम सफ़र अपने बदल कर वो तो बस चलते रहे,
और मैं उनकी डगर में फूल बिखराता रहा.

एक दिन काँटा चुभा पगडंडियों में हुस्न की,
ज़िन्दगी भर रहगुज़र में इश्क़ तड़पाता रहा.

ख़ास है कुछ आम सा तेरा तबस्सुम दिलरुबा,
उम्र भर जो ज़िन्दगी में रौशनी लाता रहा.

इश्क़ में मसरूफ़ थे कंकड़ उछाला ही नहीं,
झील के तल में उतर कर चाँद सुस्ताता रहा.

एक दिन यादों की बुग्नी से निकल कर माँ मिली,
और बच्चा बन के मैं बाहों में इतराता रहा.

सोमवार, 26 जुलाई 2021

इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी ...

अब लगी, तब ये लगी, लग ही गई लत तेरी I
कब हुई, कैसे हुई, हो गई आदत तेरी I
 
ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I
 
तुम जो अक्सर ही सुड़कती हो मेरे प्याले से,
चाय की लत न कहूँ क्या कहूँ चाहत तेरी I
 
तुम कहीं मेरी खिंचाई तो नहीं करती हो,
एक अनसुलझी सी उलझन है ये उलफ़त तेरी I
 
शाल पहनी थी जो उस रोज़ न माँगी अब तक,
इब्तिदा प्रेम की कह दूँ के इनायत तेरी I
 
पहने रहती थीं पुलोवर जो मेरा तुम दिन भर,
उसके रेशों से महकती है नज़ाफ़त तेरी I
 
उड़ती फिरती है जो तितली वो अभी कह के गई,
इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी
I

बुधवार, 14 जुलाई 2021

चाँद उतरा, बर्फ पिघली, ये जहाँ महका दिया ...

बादलों के पार तारों में कहीं छुड़वा दिया I 
चन्द टूटी ख्वाहिशों का दर्द यूँ बिखरा दिया I
 
एक बुन्दा क्या मिला यादों की खिड़की खुल गई, 
वक़्त ने बरसों पुराने इश्क़ को सुलगा दिया I
 
करवटों के बीच सपनों की ज़रा दस्तक हुई, 
रात ने झिर्री से तीखी धूप को सरका दिया I
 
आसमानी चादरें माथे पे उतरी थीं अभी,
एक तितली ने पकड़ कर चाँद को बैठा दिया I
 
प्रेम का सच आँख से झरता रहा आठों पहर,
और होठों के सहारे झूठ था, बुलवा दिया I  
 
पेड़ ने पत्ते गिराए पर हवा के ज़ोर पे,
और सारा ठीकरा पतझड़ के सर रखवा दिया I
 
एक चरवाहे की मीठी धुन पहाड़ी से उठी,
चाँद उतरा, बर्फ पिघली, ये जहाँ महका दिया I
 

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

दिल से अपने पूछ के देखो ज़रा ...

बात उन तक तो ये पहुँचा दो ज़रा.
शर्ट का टूटा बटन टांको ज़रा.
 
छा रही है कुछ उदासी देर से,
बज उठो मिस कॉल जैसे तो ज़रा.
 
बात गर करनी नहीं तो मत करो,
चूड़ियों को बोल दो, बोलो ज़रा.
 
खिल उठेगा यूँ ही जंगली फूल भी,
पंखुरी पे नाम तो छापो ज़रा.  
 
तुमको लग जाएगी अपनी ही नज़र,
आईने में भी कभी झाँको ज़रा.
 
तितलियाँ जाती हुई लौट आई हैं,
तुम भी सीटी पे ज़रा, पलटो ज़रा.
 
उफ़, लिपस्टिक का ये कैसा दाग है, 
इस मुए कौलर को तो पौंछो ज़रा.
 
खेल कर, गुस्सा करो, क्या ठीक है, 
हार से पहले कहो, हारो ज़रा.
 
बोलती हो, सच में क्या छोड़ोगी तुम,
दिल से अपने पूछ के देखो ज़रा.

बुधवार, 23 जून 2021

पंख लगा कर पंछी जैसे चल अम्बर चलते हैं ...

सर्द हवा में गर्म चाय का थर्मस भर चलते हैं.
पंख लगा कर पंछी जैसे चल अम्बर चलते हैं.
 
खिड़की खुली देख कर उस दिन शाम लपक कर आई,
हाथ पकड़ कर बोली बेटा चल छत पर चलते हैं.
 
पर्स हाथ में ले कर जब वो पैदल घर से निकली,
इश्क़ ने फिर चिल्ला के बोला चल दफ्तर चलते हैं.
 
सब के साथ तेरी आँखों में दिख जाती है हलचल,
जब जब बूट बजाते हम जैसे अफसर चलते हैं.
 
गश खा कर कुछ लोग गिरे थे, लोगों ने बोला था,
पास मेरे जब आई बोली चल पिक्चर चलते हैं.
 
जब जब उम्र ठहरने लगती दफ्तर की टेबल पे,
धूल फांकती फ़ाइल बोली चल अब घर चलते हैं.
 
याद किसी की नींद कहाँ आने देगी आँखों में,
नींद की गोली खा ले चल उठ अब बस कर चलते हैं. 

शुक्रवार, 11 जून 2021

कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं ...

देख कर तुमको जहाँ में और कुछ भाया नहीं.
कैसे कह दूँ ज़िन्दगी में हमने कुछ पाया नहीं.
 
सोच लो तानोगे छतरी या तुम्हे है भीगना,
आसमाँ पे प्रेम का बादल अभी छाया नहीं.
 
प्रेम की पग-डंडियों पर पाँव रखना सोच कर,  
लौट कर इस राह से वापस कोई आया नहीं.
 
पत्थरों से दिल लगाने का हुनर भी सीख लो,
फिर न कहना वक़्त रहते हमने समझाया नहीं.
 
प्रेम हो, शृंगार, मस्ती, या विरह की बात हो,
कौन सा है रंग जिसको प्रेम ने गाया नहीं.
 
तुमको पाया, रब को पाया, और क्या जो चाहिए,
कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं.

गुरुवार, 3 जून 2021

तीरगी की आड़ ले कर रौशनी छुपती रही ...

इक पुरानी याद दिल से मुद्दतों लिपटी रही.
घर, मेरा आँगन, गली, बस्ती मेरी महकी रही.
 
कुछ उजाले शाम होते ही लिपटने आ गए,
रात भर ये रात छज्जे पर मेरे अटकी रही.
 
लौट कर आये नहीं कुछ पैर आँगन में मेरे,
इक उदासी घर के पीपल से मेरे लटकी रही.
 
उनकी आँखों के इशारे पर सभी मोहरे हिले,
जीत का सेहरा भी उनका हार भी उनकी रही.
 
चाँद का ऐसा जुनूं इस रात को ऐसा चढ़ा,
रात सोई फिर उठी फिर रात भर उठती रही.
 
रौशनी के चोर चोरी रात में करने चले,
तीरगी की आड़ ले कर रौशनी छुपती रही.

बुधवार, 26 मई 2021

घुमड़ते बादलों को प्रेम का कातिब बना देना ...

घुमड़ते बादलों को प्रेम का कातिब बना देना.
सुलगती शाम के मंज़र को गजलों में बता देना.
 
बदल जाएगा मौसम धूप में बरसात आएगी,
मिलन के चार लम्हे जिंदगी के गुनगुना देना.
 
बुराई ही नहीं अच्छाई भी होती है दुनिया में,
बुरा जो ढूंढते हर वक़्त उनको आईना देना.
 
तलाशी दे तो दूं दिल की तुम्हारा नाम आये तो, 
तुम्हें बदनाम करने का मुझे इलज़ाम ना देना.
 
दिलों के खेल में जो ज़िन्दगी को हार बैठे हैं,
उन्हें झूठी मुहब्बत का कभी मत झुनझुना देना.

मंगलवार, 11 मई 2021

आकाश में तारों का आज रात पिघलना ...

जेबों में चराग़ों को अपने ले के निकलना.
मुमकिन है के थम जाए आज रात का ढलना.
 
है गाँव उदासी का आस-पास संभालना.
हो पास तेरे कह-कहों का शोर तो चलना.
 
मासूम पतंगों की ज़िन्दगी से न खेलो,
हर बार तो अच्छा नहीं मशाल का जलना.
 
कश्ती को चलाने में होंसला है ज़रूरी,
मंज़ूर नहीं हम को साहिलों पे फिसलना.
 
पतझड़ के हैं पत्ते न दर्द रोक सकोगे,
क़दमों को बचा कर ही रास्तों पे टहलना.
 
हर मोड़ पे आती हैं लौटने की सदाएँ,
रिश्तों को समझ कर ही अपने घर को बदलना.
 
आहों का असर था के कायनात की साज़िश,
आकाश में तारों का आज रात पिघलना. 

मंगलवार, 4 मई 2021

शिव कहाँ जो जीत लूँगा मृत्यु को पी कर ज़हर ...

लुप्त हो जाते हें जब इस रात के बोझिल पहर.
मंदिरों की घंटियों के साथ आती है सहर.


शाम की लाली है या फिर श्याम की लीला कोई,
गेरुए से वस्त्र ओढ़े लग रहा है ये शहर.
 
पूर्णिमा का चाँद हो के हो अमावस की निशा,
प्रेम के सागर में उठती है निरंतर इक लहर.
 
एक पल पर्दा उठा, नज़रें मिलीं, उफ़ क्या मिलीं,
हो वही बस एक पल फिर जिंदगी जाए ठहर. 
 
धूप नंगे सर उतर आती है छत पर जब कभी,
तब सुलग उठता है घर आँगन गली, सहरा दहर.
 
शब्द जैसे बांसुरी की तान मीठी सी कहीं,
तुम कहो सुनता रहूँगा, काफिया हो, क्या बहर.
 
इस विरह की वेदना तो प्राण हर लेगी मेरे,
शिव कहाँ जो जीत लूँगा मृत्यु को पी कर ज़हर.

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

रेशा-रेशा जो कभी हम उधड़ गए होते ...

पाँव बादल पे उसी रोज़ पड़ गए होते.
पीठ पर हम जो परिन्दों के चढ़ गए होते.
 
जिस्म पत्थर है निकल जाता आग का दरिया,
एक पत्थर से कभी हम रगड़ गए होते.
 
ढूँढ़ते लोग किसी फिल्म की कहानी में,
घर से बचपन में कभी हम बिछड़ गए होते.
 
फिर से उम्मीद नई एक बंध गई होती,  
वक़्त पे डाल से पत्ते जो झड़ गए होते.
 
आँधियाँ तोड़ न पातीं कभी जड़ें अपनी,
घास बन कर जो ज़मीनों में गढ़ गए होते.
 
ढूँढ ही लेते हमें ज़िन्दगी के किस्सों में,
वक़्त के गाल पे चाँटा जो गढ़ गए होते.
 
बन के रह जाती किसी रोज़ ज़िन्दगी उलझन,
रेशा-रेशा जो कभी हम उधड़ गए होते.

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

कन्धे पे अपने भार उठाएँ ... मुझे न दें ...

ले कर गुलाब रोज़ ही आएँ मुझे न दें.
गैरों का साथ यूँ ही निभाएँ मुझे न दें.
 
गम ज़िन्दगी में और भी हैं इश्क़ के सिवा,
कह दो की बार बार सदाएँ मुझे न दें.
 
इसको खता कहें के कहें इक नई अदा,
हुस्ने-बहार रोज़ लुटाएँ मुझे न दें.
 
सुख चैन से कटें जो कटें जिंदगी के दिन,
लम्बी हो ज़िन्दगी ये दुआएँ मुझे न दें.
 
शायद में उनके इश्क़ के काबिल नहीं रहा, 
आखों से वो शराब पिलाएँ ... मुझे न दें.
 
खेलें वो खेल इश्क़ में पर दर्द हो मुझे,
उनका है ये गुनाह सज़ाएँ ... मुझे न दें.
 
उम्मीद दोस्तों से नहीं थी, मगर था सच,
हिस्सा मेरा वो रोज़ उठाएँ ... मुझे न दें.
 
खुशबू भरे वो ख़त जो मेरे नाम थे लिखे,
खिड़की से रोज़ रोज़ उड़ाएँ ... मुझे न दें.
 
देखा है ज़िंदगी में पिता जी को उम्र भर,
कन्धे पे अपने भार उठाएँ ... मुझे न दें.

बुधवार, 31 मार्च 2021

चले भी आओ के दिल की खुली हैं दीवारें ...

ये सोच-सोच के हैरान सी हैं दीवारें
घरों के साथ ही दिल में खिची हैं दीवारें
 
लगे जो जोर से धक्के गिरी हैं दीवारें
कदम-कदम जो चले खुद हटी हैं दीवारें
 
सभी ने मिल के ये सोचा तो कामयाबी है 
जहाँ है सत्य वहीं पर झुकी हैं दीवारें
 
इन्हें तो तोड़ ही देना अभी तो हैं कच्ची    
हमारे बीच जो उठने लगी हैं दीवारें
 
ये सच है खुद ही इसे आजमा के समझोगे
छुआ जो इश्क़ ने दिल से मिटी हैं दीवारें
 
ये बोलती हैं कई बार कुछ इशारों से
छुपा के राज़ कहाँ रख सकी हैं दीवारें
 
यहीं पे शाल टंगी थी यहाँ पे थी फोटो
किसी की याद से कितना जुड़ी हैं दीवारें
 
किसी ने बीज यहाँ बो दिए हैं नफरत के
सुना है शह्र में तबसे उगी हैं दीवारें
 
तुम्हें दिया है निमंत्रण तुम्हें ही आना है 
चले भी आओ के दिल की खुली हैं दीवारें

मंगलवार, 23 मार्च 2021

छू लिया तुझको तो शबनम हो गई ...

सच की जब से रौशनी कम हो गई.
झूठ की आवाज़ परचम हो गई.
 
दिल का रिश्ता है, में क्यों न मान लूं,
मिलके मुझसे आँख जो नम हो गई.
 
कागज़ों का खेल चालू हो गया,
आंच बूढ़े की जो मद्धम हो गई.
 
मैं ही मैं बस सोचता था आज तक, 
दुसरे “मैं” से मिला हम हो गई.
 
फूल, खुशबू, धूप, बारिश, तू-ही-तू,
क्या कहूँ तुझको तु मौसम हो गई.
 
बूँद इक मासूम बादल से गिरी,
छू लिया तुझको तो शबनम हो गई.

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

चम्मच कहीं नहीं था शरबत घोला जब ...

होट बजे थे उठा जिगर में शोला जब.
नंगे पाँव चली थी कुड़ी पटोला जब.
 
आसमान में काले बादल गरजे थे,  
झट से रिब्बन हरा-हरा सा खोला जब.
 
टैली-पैथी इसको ही कहते होंगे,
दिखती हो तुम दिल को कभी टटोला जब.
 
बीस नहीं मुझको इक्किस ही लगती हो,  
नील गगन के चाँद को तुझसे तोला जब.
 
इश्क़ लिखा था जंगली फूल के सीने पर,
बैठा, उड़ा, हरी तितली का टोला जब.
 
चूड़ी में, आँखों में, प्रेम की हाँ ही थी,
इधर, उधर, सर कर के ना-ना बोला जब.
 
चीनी सच में थी या ऊँगली घूमी थी,
चम्मच कहीं नहीं था शरबत घोला जब. 

बुधवार, 10 मार्च 2021

तीरगी के शह्र आ कर छूट, परछाई, गई ...

पाँव दौड़े, महके रिब्बन, चुन्नी लहराई, गई.
पलटी, फिर पलटी, दबा कर होंठ शरमाई, गई.
 
खुल गई थी एक खिड़की कुछ हवा के जोर से,
दो-पहर की धूप सरकी, पसरी सुस्ताई, गई.
 
आसमां का चाँद, मैं भी, रूबरू तुझसे हुए,
टकटकी सी बंध गई, चिलमन जो सरकाई, गई.
 
यक-ब-यक तुम सा ही गुज़रा, तुम नहीं तो कौन था,
दफ-अतन ऐसा लगा की बर्क यूँ आई, गई.
 
था कोई पैगाम उनका या खुद उसको इश्क़ था,
एक तितली उडती उडती आई, टकराई, गई.
 
जानती है पल दो पल का दौर ही उसका है बस,
डाल पर महकी कलि खिल आई, मुस्काई, गई.
 
दिन ढला तो ज़िन्दगी का साथ छोड़ा सबने ज्यूँ,
तीरगी के शह्र आ कर छूट, परछाई,
गई.  

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

हम नई कहानी सबको पेलते रहे ...

लोग तो चले गए मगर पते रहे.
याद के बुझे से तार छेड़ते रहे.  
 
जल गया मकान हाथ सेकते रहे.
सब तमाशबीन बन के देखते रहे.
 
इस तरफ तो कर दिया इलाज़ दर्द का,
और घाव उस तरफ कुरेदते रहे.
  
फर्श पे गिरे हैं अर्श से जो झूठ के,
ख़्वाब इतने साल हमें बेचते रहे.
 
हार तय थी दिल नहीं था मानता मगर.
उनकी इक नज़र पे दाव खेलते रहे.
 
चिंदी चिंदी खत हवा के नाम कर दिया,
इस तरह से दिल वो मेरा छेड़ते रहे.
 
वो गए तो सबने पूछा माज़रा है क्या,
हम नई कहानी सबको पेलते रहे.

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

सुर्ख होठों पे आग़ सी ना हो ...

गम न हो गम ख़ुशी ख़ुशी ना हो. 
रब करे ऐसी ज़िन्दगी ना हो.
 
रेत पर लिख दिया तुझे उस दिन,
ख्वाहिशों की वहाँ नदी ना हो.
 
चुप से आँसू  हँसी में क्यों छलके,
मुसकराहट ये खोखली ना हो.
 
नींद कमबख्त दूर है बैठी,
रात पहलू में जागती ना हो.
 
खुशबुओं से महक उठा मौसम,
तू कहीं पास ही खड़ी ना हो.
 
कितने सपने हैं बन्द बस्तों में,
परवरिश में कहीं कमी ना हो.
 
लफ्ज़ दर लफ्ज़ जल गया लम्हा,
सुर्ख होठों पे आग़ सी ना हो.

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

नाचती लहरों से मैं ऊँचाइयाँ ले जाऊँगा ...

आपका गम आपकी रुस्वाइयाँ ले जाऊँगा.
देखते ही देखते परछाइयाँ ले जाऊंगा .
 
आपने मुझको कभी माना नहीं अपना मगर,
ज़िन्दगी से आपकी कठिनाइयाँ ले जाऊँगा.
 
हाथ से छू कर कभी महसूस तो कर लो हमें, 
आपके सर की कसम तन्हाइयाँ ले जाऊँगा.
 
आपकी महफ़िल में आकर आपके पहलू से में, 
शोख नज़रों से सभी अमराइयाँ ले जाऊँगा.
 
प्रेम की बगिया कभी खिलने नहीं देते हें जो, 
वक़्त के पन्नों से वो सच्चाइयाँ ले जाऊँगा.
 
साहिलों पे डर जाना देख कर लहरों को तुम,
नाचती लहरों से मैं ऊँचाइयाँ ले जाऊँगा.