बुधवार, 27 जनवरी 2021

कुछ हैं तेरी याद से जुड़े हुए ...

गिर गए हैं और कुछ खड़े हुए.
पेड़ आँधियों में हैं डटे हुए.
 
बंट रहा है मुफ़्त में ही कुछ कहीं,
आदमी पे आदमी चढ़े हुए.
 
दूध तो नसीब में नहीं है अब,
हम तो छाछ से भी हैं जले हुए.
 
रोज एक इम्तिहान है नया,
हम भी इस तरह से कुछ बड़े हुए.
 
बादलों का साथ दे रही हवा,
सामने हैं सूर्य के अड़े हुए.
 
चुप थे पैरवी में चश्म-दीद सब,
नोट कह रहे थे कुछ मुड़े हुए.
 
कुछ निकल गए बना के हम-सफ़र, 
कुछ हैं तेरी याद से जुड़े हुए.

28 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!दिगंबर जी ,क्या बात है ,बेहतरीन सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2022...वक़्त ठहरता नहीं...) पर गुरुवार 28 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!




    जवाब देंहटाएं
  3. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 29-01-2021) को
    "जन-जन के उन्नायक"(चर्चा अंक- 3961)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  4. बादलों का साथ दे रही हवा,
    सामने हैं सूर्य के अड़े हुए.

    चुप थे पैरवी में चश्म-दीद सब,
    नोट कह रहे थे कुछ मुड़े हुए.नायाब शेर..नायाब ग़ज़ल..

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत बढ़िया गजल,दिगम्बर भाई।

    जवाब देंहटाएं
  6. मतलब के आगे सब बौने, जिसका कोई नहीं उसको कुछ नहीं हासिल होने वाला
    जिसके पास कुछ नहीं उसे सब छोड़ देते हैं, उसके पास यादें ही शेष रह जाती हैं

    बहुत खूब!

    जवाब देंहटाएं
  7. बादलों का साथ दे रही हवा,
    सामने हैं सूर्य के अड़े हुए.

    चुप थे पैरवी में चश्म-दीद सब,
    नोट कह रहे थे कुछ मुड़े हुए.

    वाह वाह !!!
    कमाल की गजल....नोटों के आगे तो चश्मदीद अंधे हो जाते हैं बोलेंगे क्या....एक से बढ़कर एक शेर....लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
  8. बेहतरीन नासवा जी! बहुत उम्दा और गहन अर्थ समेटे सुंदर ग़ज़ल।

    जवाब देंहटाएं
  9. नमस्कार नासवा जी, क्या खूब ल‍िखी''जन-जन की पीर'' क‍ि


    रोज एक इम्त‍िहान है मेरा, हम भी इस तरह से बड़े हुए...

    जवाब देंहटाएं
  10. चुप थे पैरवी में चश्म-दीद सब,
    नोट कह रहे थे कुछ मुड़े हुए.
    वाह ! उम्दा गजल

    जवाब देंहटाएं
  11. बंट रहा है मुफ़्त में ही कुछ कहीं,
    आदमी पे आदमी चढ़े हुए.....
    वाह, किसान आन्दोलन की कृत्रिमता की एक झलक ले आई है आपकी यह पंक्ति।
    लोग कैसे, अपने ही घर को रौंदते हैं, विश्वास नहीं होता।
    प्रजातंत्र या भीड़तंत्र?????

    जवाब देंहटाएं
  12. वाह! वाह!
    बेहद उम्दा 👌 सटीक पंक्तियाँ।

    जवाब देंहटाएं

  13. चुप थे पैरवी में चश्म-दीद सब,
    नोट कह रहे थे कुछ मुड़े हुए.

    ....एक से बढ़कर एक शेर....लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
  14. चुप थे पैरवी में चश्म-दीद सब,
    नोट कह रहे थे कुछ मुड़े हुए....
    कितनी गहरी बात ! सभी शेर बेहतरीन। सादर।

    जवाब देंहटाएं
  15. विडंबनाओं की भरी पूरी ग़ज़ल है--

    बादलों का साथ दे रही हवा,
    सामने हैं सूर्य के अड़े हुए.

    जवाब देंहटाएं
  16. रोज एक इम्तिहान है नया,
    हम भी इस तरह से कुछ बड़े हुए.
    अप्रतिम और एकदम स्वाभाविक ! 

    जवाब देंहटाएं

  17. चुप थे पैरवी में चश्म-दीद सब,
    नोट कह रहे थे कुछ मुड़े हुए',,,,,,,,',,,,सच बात है यही हक़ीक़त है बहुत सुंदर ।

    जवाब देंहटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है