मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

रेशा-रेशा जो कभी हम उधड़ गए होते ...

पाँव बादल पे उसी रोज़ पड़ गए होते.
पीठ पर हम जो परिन्दों के चढ़ गए होते.
 
जिस्म पत्थर है निकल जाता आग का दरिया,
एक पत्थर से कभी हम रगड़ गए होते.
 
ढूँढ़ते लोग किसी फिल्म की कहानी में,
घर से बचपन में कभी हम बिछड़ गए होते.
 
फिर से उम्मीद नई एक बंध गई होती,  
वक़्त पे डाल से पत्ते जो झड़ गए होते.
 
आँधियाँ तोड़ न पातीं कभी जड़ें अपनी,
घास बन कर जो ज़मीनों में गढ़ गए होते.
 
ढूँढ ही लेते हमें ज़िन्दगी के किस्सों में,
वक़्त के गाल पे चाँटा जो गढ़ गए होते.
 
बन के रह जाती किसी रोज़ ज़िन्दगी उलझन,
रेशा-रेशा जो कभी हम उधड़ गए होते.

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

कन्धे पे अपने भार उठाएँ ... मुझे न दें ...

ले कर गुलाब रोज़ ही आएँ मुझे न दें.
गैरों का साथ यूँ ही निभाएँ मुझे न दें.
 
गम ज़िन्दगी में और भी हैं इश्क़ के सिवा,
कह दो की बार बार सदाएँ मुझे न दें.
 
इसको खता कहें के कहें इक नई अदा,
हुस्ने-बहार रोज़ लुटाएँ मुझे न दें.
 
सुख चैन से कटें जो कटें जिंदगी के दिन,
लम्बी हो ज़िन्दगी ये दुआएँ मुझे न दें.
 
शायद में उनके इश्क़ के काबिल नहीं रहा, 
आखों से वो शराब पिलाएँ ... मुझे न दें.
 
खेलें वो खेल इश्क़ में पर दर्द हो मुझे,
उनका है ये गुनाह सज़ाएँ ... मुझे न दें.
 
उम्मीद दोस्तों से नहीं थी, मगर था सच,
हिस्सा मेरा वो रोज़ उठाएँ ... मुझे न दें.
 
खुशबू भरे वो ख़त जो मेरे नाम थे लिखे,
खिड़की से रोज़ रोज़ उड़ाएँ ... मुझे न दें.
 
देखा है ज़िंदगी में पिता जी को उम्र भर,
कन्धे पे अपने भार उठाएँ ... मुझे न दें.