बुधवार, 7 अप्रैल 2021

कन्धे पे अपने भार उठाएँ ... मुझे न दें ...

ले कर गुलाब रोज़ ही आएँ मुझे न दें.
गैरों का साथ यूँ ही निभाएँ मुझे न दें.
 
गम ज़िन्दगी में और भी हैं इश्क़ के सिवा,
कह दो की बार बार सदाएँ मुझे न दें.
 
इसको खता कहें के कहें इक नई अदा,
हुस्ने-बहार रोज़ लुटाएँ मुझे न दें.
 
सुख चैन से कटें जो कटें जिंदगी के दिन,
लम्बी हो ज़िन्दगी ये दुआएँ मुझे न दें.
 
शायद में उनके इश्क़ के काबिल नहीं रहा, 
आखों से वो शराब पिलाएँ ... मुझे न दें.
 
खेलें वो खेल इश्क़ में पर दर्द हो मुझे,
उनका है ये गुनाह सज़ाएँ ... मुझे न दें.
 
उम्मीद दोस्तों से नहीं थी, मगर था सच,
हिस्सा मेरा वो रोज़ उठाएँ ... मुझे न दें.
 
खुशबू भरे वो ख़त जो मेरे नाम थे लिखे,
खिड़की से रोज़ रोज़ उड़ाएँ ... मुझे न दें.
 
देखा है ज़िंदगी में पिता जी को उम्र भर,
कन्धे पे अपने भार उठाएँ ... मुझे न दें.