शुक्रवार, 11 जून 2021

कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं ...

देख कर तुमको जहाँ में और कुछ भाया नहीं.
कैसे कह दूँ ज़िन्दगी में हमने कुछ पाया नहीं.
 
सोच लो तानोगे छतरी या तुम्हे है भीगना,
आसमाँ पे प्रेम का बादल अभी छाया नहीं.
 
प्रेम की पग-डंडियों पर पाँव रखना सोच कर,  
लौट कर इस राह से वापस कोई आया नहीं.
 
पत्थरों से दिल लगाने का हुनर भी सीख लो,
फिर न कहना वक़्त रहते हमने समझाया नहीं.
 
प्रेम हो, शृंगार, मस्ती, या विरह की बात हो,
कौन सा है रंग जिसको प्रेम ने गाया नहीं.
 
तुमको पाया, रब को पाया, और क्या जो चाहिए,
कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं.

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय गजल

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  2. देख कर तुमको जहाँ में और कुछ भाया नहीं.
    कैसे कह दूँ ज़िन्दगी में हमने कुछ पाया नहीं.

    सोच लो तानोगे छतरी या तुम्हे है भीगना,
    आसमाँ पे प्रेम का बादल अभी छाया नहीं.
    ..बहुत सुंदर भावों का सृजन,जीवन को परिपूर्ण करता हुआ,बहुत शुभकामनाएँ आपको दिगम्बर जी।

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  3. गजब ढा दिया सरकार। प्रेम में सराबोर सब कुछ। जय हो

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  4. वाह !
    प्रेम की पग-डंडियों पर पाँव रखना सोच कर,
    लौट कर इस राह से वापस कोई आया नहीं.

    बेहद उम्दा शायरी !

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  5. वाह! अद्भुत भावों की सुंदर ग़ज़ल हर शेर लाजवाब।

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  6. देख कर तुमको जहाँ में और कुछ भाया नहीं.
    कैसे कह दूँ ज़िन्दगी में हमने कुछ पाया नहीं.
    वाह!!!
    प्रेम की पग-डंडियों पर पाँव रखना सोच कर,
    लौट कर इस राह से वापस कोई आया नहीं.
    क्या बात ....कमाल की गजल एक से बढ़कर एक शेर...
    लाजवाब।

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  7. पत्थरों से दिल लगाने का हुनर भी सीख लो,
    फिर न कहना वक़्त रहते हमने समझाया नहीं.

    वाह बहुत ही बेहतरीन पेशकश ।
    बाकमाल ग़ज़ल पेश की है आ0 दिगम्बर साहब ।
    मेरी जानिब से ढ़ेरों दाद वसूल पाइएगा ।

    सादर

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