सोमवार, 26 जुलाई 2021

इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी ...

अब लगी, तब ये लगी, लग ही गई लत तेरी I
कब हुई, कैसे हुई, हो गई आदत तेरी I
 
ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I
 
तुम जो अक्सर ही सुड़कती हो मेरे प्याले से,
चाय की लत न कहूँ क्या कहूँ चाहत तेरी I
 
तुम कहीं मेरी खिंचाई तो नहीं करती हो,
एक अनसुलझी सी उलझन है ये उलफ़त तेरी I
 
शाल पहनी थी जो उस रोज़ न माँगी अब तक,
इब्तिदा प्रेम की कह दूँ के इनायत तेरी I
 
पहने रहती थीं पुलोवर जो मेरा तुम दिन भर,
उसके रेशों से महकती है नज़ाफ़त तेरी I
 
उड़ती फिरती है जो तितली वो अभी कह के गई,
इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी
I

29 टिप्‍पणियां:

  1. वाह दिगम्बर जी ! आज सबसे पहले आपकी शानदार ग़ज़ल से मुखातिब हूँ | वाह के अलावा क्या कहा जा सकता है -- मुहब्बत के लम्हों की खुशबु से महकती ग़ज़ल के लिए हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई |👌👌👌🙏🙏💐💐🌷💐

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  2. एक से एक बढ़कर खेत 👌👌👌🙏🌷🌷🙏💐💐

    ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
    इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I///
    तुम जो अक्सर ही सुड़कती हो मेरे प्याले से,
    चाय की लत न कहूँ क्या कहूँ चाहत तेरी I////
    🙏🙏🙏🙏🙏

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  3. अब लगी, तब ये लगी, लग ही गई लत तेरी I
    कब हुई, कैसे हुई, हो गई आदत तेरी I

    ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
    इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I
    वाह ! लग ही गई लत तेरी !

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  4. आपकी क़लम का जादू तो शायरी के शैदाइयों के सर पर चढ़कर बोलने वाला है दिगंबरजी।

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  5. सब कुछ तो उन्हीं का है ... शरारत भी और इनायत भी ।

    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल 👌👌👌👌

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  6. ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
    इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I
    तुम जो अक्सर ही सुड़कती हो मेरे प्याले से,
    चाय की लत न कहूँ क्या कहूँ चाहत तेरी I
    ,, एकदम बोल उठती आपकी गजल, कमाल का हुनर पाया है आपने, कैसे इतनी सहजता आती है लेखन में!

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  7. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में बुधवार 28 जुलाई 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  8. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार(२८-०७-२०२१) को
    'उद्विग्नता'(चर्चा अंक- ४१३९)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  9. कब, कैसे, किसकी आदत पड़ जाती है, पता ही नहीं चलता ! सालता है फिर, उसका ना होना

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  10. वाह !
    खतो-किताबत हो गयी, एक ही प्याले से चाय भी पी ली गयी, शाल और पुलोवर का आदान-प्रदान भी हो गया और आप की मुहब्बत अब भी भटक रही है?

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  11. बहुत ही सुंदर रचना। अनुपम

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  12. वाह! खूबसूरत अन्दाज़

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  13. सुंदर खूबसूरत ग़ज़ल।
    हर शेर लाजवाब।

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  14. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है। बहुत सुंदर।बधाई सर। सादर।

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  15. प्रशंसा के लिए भी शब्द कहीं खो जाते हैं । ऐसा भी खोना होता है क्या ?

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  16. ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
    इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I
    वाह!!!
    पहने रहती थीं पुलोवर जो मेरा तुम दिन भर,
    उसके रेशों से महकती है नज़ाफ़त तेरी I
    वाहवाह!!!
    क्या बात....
    लाजवाब बस लाजवाब...।

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  17. अब लगी, तब ये लगी, लग ही गई लत तेरी I
    कब हुई, कैसे हुई, हो गई आदत तेरी I',,,,,,,कुछ अलग और नए अंनदाज में लिखा है आपने बहुत लाजवाब, आदरणीय शुभकामनाएँ

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  18. उड़ती फिरती है जो तितली वो अभी कह के गई,
    इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी I
    क्या बात है ! आनंद आ जाता है आपको पढ़ के

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है