सोमवार, 30 अगस्त 2021

चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू …

साहिल की भीगी रेत से लहरों की गुफ़्तगू.
सुन कर भी कौन सुनता है बहरों की गुफ़्तगू.

कुछ सब्ज पेड़ सुन के उदासी में खो गए,
खेतों के बीच सूखती नहरों की गुफ़्तगू.

अब आफ़ताब का भी निकलना मुहाल है,
इन बादलों से हो गई कुहरों की गुफ़्तगू.

ख़ामोशियों के पास जमा रहती हैं सभी,
फ़ुर्कत के चंद लम्हों से पहरों की गुफ़्तगू.

जंगल ने कान में है कहा गाँव के यही,
कितनी जुदा है आज भी शहरों की गुफ़्तगू.

गुमसुम सी महफ़िलों की हक़ीक़त सुनो कभी,
चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू.

27 टिप्‍पणियां:

  1. गुमसुम सी महफ़िलों की हक़ीक़त सुनो कभी,
    चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू.
    वाह बहुत खूब

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  2. ख़ामोशियों के पास जमा रहती हैं सभी,
    फ़ुर्कत के चंद लम्हों से पहरों की गुफ़्तगू.
    बहुत खूब ! अत्यंत सुन्दर कृति ।

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  3. बहुत बहुत सुन्दर बढ़िया गजल मुश्किल काफियों को निभाते हुए । बहुत सुन्दर ।

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  4. गुमसुम सी महफ़िलों की हक़ीक़त सुनो कभी,
    चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू.

    बहुत खूब,एक-एक शेर लाज़बाब,सादर नमन आपको

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  5. बहुत खूब नासवा जी, कुछ सब्ज पेड़ सुन के उदासी में खो गए,
    खेतों के बीच सूखती नहरों की गुफ़्तगू....ये गुफ़्तगू ज़‍िंदगी की सारी जद्दोजहद को अपने कि‍तनी आसानी से बयां कर द‍िया। वाह

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  6. यहाँ बस डूब जाना होता है । बस सुखद अहसास ... डूबते हुए ।

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  7. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 1 सितंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
    !

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  8. ख़ामोशियों के पास जमा रहती हैं सभी,
    फ़ुर्कत के चंद लम्हों से पहरों की गुफ़्तगू.

    जंगल ने कान में है कहा गाँव के यही,
    कितनी जुदा है आज भी शहरों की गुफ़्तगू.


    बहुत सुंदर...

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  9. जंगल ने कान में है कहा गाँव के यही,
    कितनी जुदा है आज भी शहरों की गुफ़्तगू.

    गुमसुम सी महफ़िलों की हक़ीक़त सुनो कभी,
    चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू.
    आज के समय की हकीकत बयां करती नायाब गजल । हर शेर कुछ न कुछ संदेश दे रहा ।

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  10. वाह!लाजवाब।
    कुछ सब्ज पेड़ सुन के उदासी में खो गए,
    खेतों के बीच सूखती नहरों की गुफ़्तगू... वाह!

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  11. वाह...'फुरकत के चंद लम्हों से पहरों की गुफ़्तगू'बहुत खूब...।

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  12. कुछ सब्ज पेड़ सुन के उदासी में खो गए,
    खेतों के बीच सूखती नहरों की गुफ़्तगू.

    वाह ! एक से बढ़कर एक शेर ! बधाई !

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  13. कितनी गहन बातें हैं इन अबोले लेखन की गुफ़्तग़ू ।
    लाजवाब /बेमिसाल ।।

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  14. एहसासों से भरी होती हैं आपकी बातें
    यहाँ आकर होती है गज़लों से गुफ़्तगू ।

    👌👌👌👌👌👌👌

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  15. बहुत सुंदर गजल,दिगम्बर भाई।

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  16. गुमसुम सी महफ़िलों की हक़ीक़त सुनो कभी,
    चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू.

    . बहुत खूब!

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  17. कुछ सब्ज पेड़ सुन के उदासी में खो गए,
    खेतों के बीच सूखती नहरों की गुफ़्तगू.
    वाह!!!
    अब आफ़ताब का भी निकलना मुहाल है,
    इन बादलों से हो गई कुहरों की गुफ़्तगू.
    क्या बात...बहुत ही लाजवाब
    एक से बढ़कर एक..।

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  18. इसे बार बार पढ़ना अच्छा लग रहा है।
    हर शेर लाजवाब।

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  19. ख़ामोशियों के पास जमा रहती हैं सभी,
    फ़ुर्कत के चंद लम्हों से पहरों की गुफ़्तगू.

    उम्दा सृजन

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  20. आदरणीय दिगम्बर नासवा जी नमस्कार।

    बेहतर समझें तो यह रचना हमारी पत्रिका ‘प्रकृति दर्शन’ के अगले अंक के लिए प्रेषित कीजिएगा। साथ ही संक्षिप्त परिचय और अपना फोटोग्राफ भी। आभार आपका।

    Prakriti Darshan
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    email- editorpd17@gmail.com
    mob/whatsapp- 8191903651

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