मंगलवार, 16 नवंबर 2021

ऊंघ रही हैं बोझिल पलकें और उबासी सोफे पर

धूप छुपी मौसम बदला फिर लिफ्ट मिल गई मौके पर.
कतरा-कतरा शाम पिघलती देखेंगे चल छज्जे पर.
 
तेरे जाते ही पसरी है एक उदासी कमरे पर,
सीलन-सीलन दीवारों पर सिसकी-सिसकी कोने पर.
 
मद्धम-मद्धम चाँद का टैरस घूँट-घूँट कौफी का टश,
पैदल-पैदल मैं आता हूँ तू बादल के टुकड़े पर.  
 
लम्हा-लम्हा इश्क़ बसंती कर देता है फिजाँ-फिजाँ,
गुलशन-गुलशन फूल खिले है इक तितली के बोसे पर.
 
चुभती हैं रह-रह कर एड़ी पर कुछ यादें कीलों सी,
धूल अभी तक तन्हा-तन्हा जमी हुई है जूते पर.
 
ठहरा-ठहरा शाम का लम्हा छपा हुआ है गाड़ा सा,
ताज़ा-ताज़ा होठ मिलेंगे फिर कौफी के मग्गे पर.
 
ठक-ठक, खट-खट, घन्टी-घन्टी गेट खड़कता रहता है,
ऊंघ रही हैं बोझिल पलकें और उबासी सोफे पर
.

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (17-11-2021) को चर्चा मंच        "मौसम के हैं ढंग निराले"    (चर्चा अंक-4251)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    --
     हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   
    'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 16 नवंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
    !

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  3. बहुत बहुत सुन्दर बहुत सराहनीय

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  4. बहुत ही सुंदर व प्यारी रचना

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  5. धूल अभी तक तन्हा-तन्हा जमी हुई है जूते पर. बहुत बढ़िया।

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  6. एक और नायाब, मनमोहक ग़ज़ल 👌👌🎈🙏🌷🌷💐💐

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  7. मद्धम-मद्धम चाँद का टैरस घूँट-घूँट कौफी का टश,
    पैदल-पैदल मैं आता हूँ तू बादल के टुकड़े पर.

    चुभती हैं रह-रह कर एड़ी पर कुछ यादें कीलों सी,
    धूल अभी तक तन्हा-तन्हा जमी हुई है जूते पर.

    वाह और सिर्फ़ वाह वाह 🙏🙏😐

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है