गुरुवार, 25 नवंबर 2021

कहीं से छूट गए पर कही से उलझे हैं

कहीं से छूट गए पर कही से उलझे हैं. 
हम अपनी ज़िन्दगी में यूँ सभी से उलझे हैं.
 
नदी है जेब में पर तिश्नगी से उलझे हैं,
अजीब लोग हैं जो खुदकशी से उलझे हैं.
 
नहीं जो प्रेम, पतंगों की ख़ुद-कुशी कह लो,
समझते-बूझते जो रौशनी से उलझे हैं.
 
तरक्कियों के शिखर झुक गए मेरी खातिर,
मगर ये दीद गुलाबी कली से उलझे हैं.
 
जो अपने सच से भी नज़रें चुरा रहे अब तक,
किसी के झूठ में वो ज़िन्दगी से उलझे हैं.  
 
सुनो ये रात हमें दिन में काटनी होगी,
अँधेरे देर से उस रौशनी से उलझे हैं.
 
किसी से नज़रें मिली, झट से प्रेम, फिर शादी,
ज़ईफ़ लोग अभी कुण्डली से उलझे हैं.
 
निगाह में तो न आते सुकून से रहते, 
गजल कही है तो उस्ताद जी से उलझे हैं.

10 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २६ नवंबर २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. बहुत ही सुंदर व प्यारी शेरो-शायरी। हर पंक्ति पढ़ कर आनंद आ गया। सुंदर रचना के लिए आभार व आपको प्रणाम।

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  3. वाह नदी है जेब में फिर। भी प्यास ....
    खूबसूरत ग़ज़ल । हर शेर एक से बढ़ कर एक ।।

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  4. सुनो ये रात हमें दिन में काटनी होगी,
    अँधेरे देर से उस रौशनी से उलझे हैं.

    वाह!! बहुत ख़ूब

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  5. किसी एक शेर को दाद दें तो दूसरा रह जाता है। अत्यंत नाज़ुक एहसाओं की कहानी कहती सरस और मधुर शेरो से सजी गज़ल के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दिगम्बर जी। नए मिजाज़ की रचना में सरल और सहज अभिव्यक्ति जो मन को छूती बस वाह कहने को विवश करती है।🙏🙏🌷🌷

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  6. किसी से नज़रें मिली, झट से प्रेम, फिर शादी,
    ज़ईफ़ लोग अभी कुण्डली से उलझे हैं.

    निगाह में तो न आते सुकून से रहते,
    गजल कही है तो उस्ताद जी से उलझे हैं.
    वाह और सिर्फ़ वाह 👌👌👌🙏🙏

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  7. वाह्ह्ह! शानदार हर शेर मुकम्मल हर शेर लाजवाब किसको कहें अच्छा बस इसी उलझन में उलझे हैं।
    बेहतरीन।

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