शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

तुम आओ ...

बहुत चाहा शब्द गढ़ना 
चाँदनी के सुर्ख गजरे ... सफ़ेद कागज़ पे उतारना
पर जाने क्यों अल्फाजों का कम्बल ओढ़े   
हवा अटकी रही, हवा के इर्द-गिर्द  
 
पंछी सोते रहे
सूरज आसमान हो गया
ढल गए ख़याल, ढल जाती है दोपहर की धूप जैसे
रात का गहराता साया
खो गया अमावस की काली आग़ोश में
शब्दों ने नहीं खोले अपने मायने
खुरदरी मिटटी में नहीं पनपने पाया सृजन
 
तुम होती तो उतर आतीं मेरे अलफ़ाज़ बन कर
न होता तो रच देता तुम्हे नज़्म-दर-नज़्म
सुजाग हो जातीं केनवस की आड़ी-तिरछी लक़ीरें
 
मेरे जंगली गुलाब तुम आओ तो शुरू हो
कायनात का हसीन क़ारोबार ...

रविवार, 25 सितंबर 2022

माँ …

बीतते बीतते आज दस वर्ष हो गएवर्ष बदलते रहे पर तारीख़ वही 25 सितम्बर … सच है जाने वाले याद रहते हैं मगर तारीख़ नहींपरदेख आज की तारीख़ ऐसी है जो भूलती ही नहीं … तारीख़ ही क्योंदिनमहीनासालकुछ भी नहीं भूलता … और तू … अब क्या कहूँ… मज़ा तो अब भी आता है तुझसे बात करने का … तुझे महसूस करने का … 


माँ हक़ीक़त में तु मुझसे दूर है.

पर मेरी यादों में तेरा नूर है.


पहले तो माना नहीं था जो कहा,

लौट कह फिर सेअब मंज़ूर है.


तू हमेशा दिल में रहती है मगर,

याद करना भी तो इक दस्तूर है.


रोक पाना था नहीं मुमकिन तुझे,

क्या करूँ अब दिल बड़ा मजबूर है.


तू मेरा संगीतगुरु-बाणीभजन,

तू मेरी वीणामेरा संतूर है.


तू ही गीता ज्ञान है मेरे लिए,

तू ही तो रसखानमीरासूर है.


तू खुली आँखों से अब दिखती नहीं,

पर तेरी मौजूदगी भरपूर है.

बुधवार, 21 सितंबर 2022

नाज़ुक ख्वाब ...

उनींदी सी रात ओढ़े
जागती आँखों ने हसीन ख्व़ाब जोड़े
 
सुबह की आहट से पहले
छोड़ आया उन्हें तेरी पलकों तले
 
कच्ची धूप की पहली किरण
तुम्हारी पलकों पे जब दस्तक दे
हौले से अपनी नज़रें उठाना
नाज़ुक से मेरे ख्वाब
बिखर न जाएँ समय से पहले कहीं ...

सोमवार, 12 सितंबर 2022

नाक़ाम इश्क़ ...

काँटों की चुभन है नाक़ाम इश्क़
रहने नहीं देती जो चैन से
महसूस होता है रिस्ता दर्द, रह-रह के चुभती कील सरीखे
 
एक अन्तहीन दौड़ की दौड़ 
क्या प्रेम की प्राप्ति के लिए ? 
या भटकता है खुद की तलाश में इन्सान ?
 
नाक़ाम इश्क़ के रिश्ते सँजोना
दीमक लगे पेड़ को जीवित रखने का प्रयास है
जो पनपने नहीं देता नए रिश्तों की नाज़ुक कोंपलें
 
काटना होता है ऐसे तमाम पेड़ों को दिल की बंज़र ज़मीन से
 
खिले होते हैं बहुत से जंगली गुलाब
नज़र भर देखना होता है आस-पास का मंज़र   
 
ज़िन्दगी की दौड़ में
समय बदलते ... समय नहीं लगता ...

बुधवार, 7 सितंबर 2022

रेशमी एहसास ...

हरे पहाड़ों की चोटियों से
उतरते सफ़ेद बादल
रुक जाते हैं बल खाती काली सड़क के सीने पर
 
ललक है तुम्हें छूने की
इतना करीब से
की समेट सकें तेरी साँसों की महक उम्र भर के लिए
 
वो जानते हैं झाँकोगी तुम खुली खिड़की से  
छुओगी नर्म हथेली से वो रेशमी एहसास ...  
ठीक उसी वक़्त मैं भी हो जाऊँगा धुँवा-धुँवा  
घुल जाऊँगा बादलों की नर्म छुवन में
 
सुन प्रकृति की अप्रतिम रचना ... मेरे जंगली गुलाब  
छू के देखना अपने माथे की चन्द लकीरों उस पल   
नमी की बूँद में महसूस करोगी मुझको    

शनिवार, 27 अगस्त 2022

एब-इनीशियो ...

क्या ऐसा होता है  
कुछ कदम किसी के साथ चले
फिर भूल गए उस हम-कदम को ज़िन्दगी भर के लिए ...
 
कुछ यादें जो उभर आई हों ज़हन में
गुम हो जाएँ चुपचाप जैसे रात का सपना ...
 
चेहरे पर उभरी कुछ झुर्रियाँ
गायब हो जाएँ यक-ब-यक जैसे जवानी का लौटना
 
उम्र का मोड़ जहाँ बस अतीत ही होता है हमसफ़र
सब कुछ हो जाए “एब-इनीशियो” ...
“जैसे कुछ हुआ ही नहीं”
 
सोचता हूँ कई कभी ...
उम्र के उस एक पढ़ाव पर “अल्ज़ाइमर” उतना भी बुरा नहीं ...   

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

श्री कृष्ण …

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की सभी को बहुत बहुत बधाई …


सकल जगत अपना हुआजीत  कोई हार 
कान्हा जी से जुड़ गएअंतर्मन के तार 


कान्हा जी ऐसा करोभीगे मन इस बार 
शरण तुम्हारी पा सकूँभव-सागर हो पार 


प्रेमसमर्पणशक्तिधनराधा के अधिकार 
दौड़े दौड़े  गएकान्हा जिनके द्वार 


पृथ्वीजल-वायूगगनअग्नि तत्व शरीर 

सुख-दुःखमायामोहजगहर बंधन में पीर 


बने द्वारिकाधीश जोरहे जगत को पाल
सखा-सखी मन जा बसेखुद हर-हर गोपाल 

सोमवार, 15 अगस्त 2022

हिन्दुस्तान ...

भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की सबको बहुत बहुत बधाई ...


प्रेम की ख़ुशबू यहाँ, बलिदान का लोबान है

इस भरत भू की तो कान्हा राम से पहचान है
इक तरफ़ उत्तर दिशा में ध्यान मय हिमवान है
और दक्षिण छोर पे सागर बड़ा बलवान है
योग-माया, शिव सनातन, निज में अंतर-ध्यान है
संस्कृती जिसकी सनातन जोगिया परिधान है
रीत, व्यंजन, धर्म, भाषा, और पहनावा जुदा
पर धड़कता है जो दिल में वो तो हिंदुस्तान है
भूमि है अन्वेषकों कि यह पुरातन काल से
वेद गीता उपनिषद में ज्ञान है विज्ञान है
खोज ही जब लक्ष्य हो तब निज की हो या हो जगत
हम कहाँ से, क्यों है जीवन, एक अनुसंधान है
देश की अवधारणा आकार देती है हमें
कर सकूँ जीवन समर्पित मन में यह अरमान है


शनिवार, 6 अगस्त 2022

फ़लसफा - लम्बी उम्र का ...

माँगता है इन्सान दुआ लम्बी उम्र की 
पर नहीं समझ पाता कौन सी उम्र  
 
ढल जाता है बचपन नासमझी में
बीत जाती है जवानी तय शुदा साँसों में
 
हाँ ... मिलती है लम्बी उम्र    
जो आती है सिर्फ बुढापे के हिस्से
उम्र के एक ऐसे पक्ष में जहाँ दर्द के सिवा कुछ नहीं होता
डर रोज़ का हिस्सा होता है
अकेलेपन का एहसास गहरे अँधेरे सा फैलता है जहाँ
 
काश की लम्बी उम्र से ज्यादा अच्छी उम्र की दुआ होती
न होता तो बचपन लम्बा हो जाता या जवानी की राह ख़त्म न होती
 
काश की लम्बी उम्र की दुआओं के बाद
आमीन बोलने से पहले कोई तो समझाता ... लम्हों का घटा जोड़
किसको पता होता है लम्बी उम्र की दुआ आती है बुढापे के हिस्से

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

कुछ एहसास ...

कुनमुनी धूप का एहसास
जब अनायास ही बदलने लगे मौसम
समझ लेना दूर कहीं यादों में
स्पर्श किया है मैंने तुम्हारा


माथे पे गिरी एक आवारा बूँद
जगाने लगे एक अनजानी प्यास
समझ लेना तन्हाई के किसी लम्हे ने
अंगड़ाई ली है कहीं


हर मौसम में खिलता जंगली गुलाब
तेरे होंटों की मुस्कुराहट लिए
महक रहा है पुरानी पगडण्डी पर
चल आज वहीं टहल आएँ …
जोड़ लें कुछ ताज़ा लम्हे, यादों की बुगनी में …

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 18 जुलाई 2022

इंतज़ार - एक प्रेम का ...

मालुम है ले गया था तुम्हारे होठों की खिलखिलाती हँसी
वो खनकते कंगन, नीले आसमानी रँगों वाली काँच की चूड़ियाँ
वो टूटी पाजेब ... धागे के सहारे जिसे पांवों में अटका रखा था तुमने
 
हर वो शै जिसमें तुम्हारे होने का एहसास हो सकता था
मेरे ट्रंक में सहेज दी थी तुमने
अगर सही सही कहूँ ... तो ले आया था मैं उसे ... 
 
मैं जानता था जुदाई का वो पल इक उम्र से लम्बा होने वाला है
 
पर सच कहूँ तो उस दौर में एक पल भी तुमसे जुदा नही था
हालांकि छोड़ आया था तुम्हे तन्हा सबके बीच यादों के सहारे
 
अब जबकि लौट रहा हूँ तुम्हारे करीब,   
चाहता हूं तमान खुशियाँ समेत दूँ तुम्हारे दामन में ...
 
भर ली है लाल डिबिया में सुबह की लाली, माँग सजाने के लिए
कैद कर ली ही बारिशों की बूँदों में नहाते परिंदों की खनकती हँसी
माँग लिया है शाम का गहरा नीला आँचल,
रात की काली चादर पे चमकते तारे और इन्द्र-धनुष के सुनहरी रँग
ध्यान से देखना पूरब की और खुलने वाली खिड़की की जानिब
घिरने लगी होंगी कुछ आँधियाँ वहाँ ...
की भेजा है हवा के हाथ इक संदेसा तुम्हारे नाम
 
हाँ वो ढेर सारा प्यार भी इकठ्ठा है जो जोड़ रहा हूँ तबसे
जब जुदा हुए थे ज़िन्दगी के फ़र्ज़ पूरा करने को
 
मैं आउँगा छत के उसी सुनसान कोने में
खड़ी होगी जहाँ तुम होठ चबाती मेरे इंतज़ार में ...

#जंगली_गुलाब 

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

दास्ताँ - एक प्रेम की

जिन टेढ़े-मेढ़े रस्तों से गुजारते हैं चरवाहे
जहाँ की मेढों पे खिलते हैं गहरे लाल रंग के जंगली फूल
जहाँ धूप के साथ उतरती है कच्ची सरसों की खुशबू
उसी के पास खेतों से आती है चूडियों की खनक 
और तुम्हारी हँसी की आवाज़ में घुलती पाजेब की धीमी छन-छन
 
रख दिए हैं ताज़ा बोसे उस पगडण्डी के ठीक बीचों बीच 
जिसके एक कोने पे एक छत है और कुछ टूटी हुई दीवारें  
मकान हो जाने की इंतज़ार में 
गुज़र जाते हैं कुछ परिंदे भी उस पगडण्डी की रेत पर
छोड़ जाते हैं पन्जों के गहरे निशान
 
बूढ़े किसान की आशा नहीं देखती रेत का समुन्दर  
और उसके आगे झिलमिलाता पानी का सैलाब
वो देखती है रेत के ठीक ऊपर दमकता काला बादल
रेत का सीना चीर के आती नमी का इंतज़ार है उसे
 
इंतज़ार तो मुझे भी है कुछ बूँदों का
उगे हुए हैं कुछ सूखे झाड़ बरसों से मेरे सूने आँगन में
फूल हो जाने की इंतज़ार में ...
गुज़र के गए हैं कुछ सैनिक अभी-अभी इस रस्ते से
भारी जूतों से धरती का सीना मसलते
सुना है आज़ाद करनी है सूखी मिट्टी, भूमि-पुत्रों से
लाल पट्टी सरों पे बांधे कर रहे हैं लाल जो सूखी धरती का आनन
कुछ नहीं होता है जिनके पास खोने को  
लुटी हुई इज्ज़त और आँखों से निकलते शोलों के सिवा
 
घास के तिनकों से बने हरे कंगन पहने हाथ 
मचलते तो जरूर होंगे बन्दूक हो जाने की इंतज़ार में
प्रेम तो उन्हें भी होता होगा ... मेरी तरह
और प्रेम के फूल पनपने के लिए हवा पानी ज़रूरी तो नहीं     
#जंगली
_गुलाब

शनिवार, 2 जुलाई 2022

प्रेम और तर्क

उस दिन आकाश में नहीं उगे तारे
तुम खड़ी रहीं बहुत देर तक उन्हें देखने की जिद्द में
 
तारों की जिद्द ... नहीं उगेंगे तुम्हारे सामने
नहीं करनी थी उन्हें बात तुम्हारे सामने  
और नहीं मंज़ूर था उन्हें दिगंबर हो जाना
उठा देना किसी के आवारा प्रेम से पर्दा
 
तर्क करने वालों ने सोचा
शोलों से लपकती तुम्हारी रौशनी की ताब
धुंधला न कर दे उन तारों को
तर्क वाले कहां समझते हैं दिल की बातें, प्रेम का मकसद 
 
जब उठने लगता है रात का गहरा आवरण  
और तुम भी आ जाती हो कमरे के भीतर
शीतल चांदनी तले पनपने लगता है एहसास का मासूम बूटा
 
आज रात सोएँगे नहीं तारे
मौका मिले तो ज़रूर देख आना आसमान पर 
जिद्द है उनकी मिट जाने की ... सुबह होने तक 

#जंगली_गुलाब

रविवार, 26 जून 2022

जवाब ...

खिड़की की चौखट पे बैठे
उदास परिंदों के प्रश्नों का जवाब किसी के पास नहीं होता 
सायं-सायं करती आवारा हवाओं के पास तो बिलकुल नहीं
 
कहाँ होती है ठीक उसके जैसी वो दूसरी चिड़िया 
घर बनाया था तिनका-तिनका जिसके साथ लचकती डाल पर  
के मिल के देख लिए थे कुछ सपने सावन के मौसम में 
आसान तो नहीं होता लम्हा-लम्हा तिनके कतरा-कतरा उम्र में उलझाना
 
हालाँकि सपनों की ताबीर उम्र में न हो तो नहीं होती मुकम्मल ज़िन्दगी
पर आसान भी नहीं होता रहना फिर उसी घोंसले में
जहाँ बेहिसाब यादों के तिनके वक़्त के साथ शरीर को लहुलुहान करने लगें 
 
कितनी अजीब होती हैं यादें किसी भी बात से ट्रिगर हो जाती हैं 
मेरे प्रश्नों का भी जवाब भी किसी के पास कहाँ होता है

बुधवार, 15 जून 2022

शिव ...

प्रार्थना के कुछ शब्द
जो नहीं पहुँच पाते ईश्वर के पास
बिखर जाते हैं आस्था की कच्ची ज़मीन पर

धीरे धीरे उगने लगते हैं वहाँ कभी न सूखने वाले पेड़
सुना है प्रेम रहता है वहाँ खुशबू बन कर  
वक़्त के साथ जब उतरती हैं कलियाँ
तो जैसे तुम उतर आती हो ईश्वर का रूप ले कर
 
आँखें मुध्ने लगती हैं, हाथ खुद-ब-खुद उठ जाते हैं
उसे इबादत ... या जो चाहे नाम दे देना  
खुशबू में तब्दील हो कर शब्द, उड़ते हैं कायनात में 
 
मैं भी कुछ ओर तेरे करीब आने लगता हूँ 
तू ही तू सर्वत्र ... तुझ में ईश्वर, ईश्वर में तू
उसकी माया, तेरा मोह, चेतन, अवचेतन
मैं ही शिव
, मैं ही सुन्दर, एकम सत्य जगत का     

बुधवार, 8 जून 2022

एहसास ...

जब तक नहीं पड़ती धूल आँखों में
एहसास नहीं होता  
आती-जाती साँसों का एहसास भी तब तक नहीं 
रुकने न लगे हवा जब तक
 
वैसे रात का एहसास भी रौशनी के जाने से नहीं
अंधेरे के आने से होता है
 
मैं जानता हूँ नहीं जुडी ऐसी कोई भी वजह तेरे एहसास के साथ
सिवाए इसके की मैं तुझे प्रेम करने के लिए पैदा हुआ हूँ
मेरे जंगली गुलाब तेरे होने का एहसास मेरी साँसों तक तो है न ...  

#जंगली_गुलाब

बुधवार, 1 जून 2022

सफ़र ज़िन्दगी का ...

ये दिन, ये शाम, ये रात, चाँद या फिर ये सूरज 
क्या सच में सब ढलते हैं या ढलती है उम्र
 
वैसे तो जाता नहीं ये रास्ता भी कहीं
हम ही चल के गुज़र जाते हैं कभी न लौटने के लिए
 
ये जिंदगी भी तो गुज़र रही है तेरे बिना
हाँ कुछ यादें साथ चलती हैं ... जैसे चलता है तारों का कारवाँ  
लम्हों के अनगिनत जुगनू ... जलते बुझते हैं सफ़र में
पर साथ नहीं देते जैसे समय भी नहीं देता साथ
 
काली सड़क पे झूलते हरे पत्तों के कैनवस
और कैनवस की डालियों पर बैठे अनगिनत रंगीन पंछी
झक्क नीले रंग में रंगा स्तब्ध आकाश
और आकाश पर रुके कायनात के कुछ किरदार
 
ठिठका पवन और चन्द आवाजों की आवाजें सड़क के दूसरी छोर पर
घने कोहरे में बनता बिगड़ता तेरा बिम्ब इशारा करता है चले आने का
 
हालांकि ये सब तिलिस्म है ... फिर भी चलने का मन करता है
यूँ भी उम्र तमाम करने को अकसर जरूरत रहती है किसी बहाने की 

शुक्रवार, 13 मई 2022

रिश्ते ...

रिश्ते कपड़े नहीं जो काम चल जाए
निशान रह जाते हैं रफू के बाद
 
मिट्टी बंज़र हो जाए तो कंटीले झाड़ उग आते हैं
मरहम लगाने की नौबत से पहले
बहुत कुछ रिस जाता है
 
हालांकि दवा एक ही है
 
वक़्त की कच्ची सुतली से जख्म की तुरपाई
जिसे सहेजना होता है तलवार की धार पे चल कर
 
संभालना होता है कांपते विश्वास को
निकालना होता है शरीर में उतरे पीलिये को 
 
रात के घने अन्धकार से 
सूरज की पहली किरण का पनपना आसान नही होता
 
ज़मीन कितनी भी अच्छी हो
जंगली गुलाब का खिलना भी कई बार
आसान नहीं होता ...

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

बातें - बातें ...

खुद से बात करना ... करते रहना ...
सोच भी पता नहीं कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है ... पर क्या करूं इंसानी फितरत ही ऐसी है ...
 
तुम न होतीं तो कोई और होता ... होता ज़रूर किसी का नाम जिंदगी की किताब में ... स्याही देता है सबको इश्वर ... खाली पन्ने भी देता है जिंदगी में किसी का नाम लिखने को
 
सोचता हूँ ... तुम न होतीं तो कौन होता ... तुम्हारे जैसा, तुमसे बेहतर, तुमसे अच्छा ... क्या पता न होता ... तुमसे बेहतर, तुमसे अच्छा
 
फिर सोचता हूँ तुम्हारे आगे पीछे ही क्यों सोचता हूँ ... तुमसे आगे क्यों नहीं ...
 
अकसर तेरा अक्स हवा में होता है हर सोच से पहले ... 
 
कितना अच्छा है कभी कभी नशे में डूब जाना, कुछ सोचो और सुबह होते-होते कुछ याद भी न रक्खो ...
उफ़ कितना बे-फजूल सोचता है तू ...

मंगलवार, 29 मार्च 2022

सौदा ...

प्यार सौदा है
जिसके बदले में कुछ नहीं मिलता 
 
मुझे तो कुछ नहीं मिला
पर सच बताना ... क्या तुम्हें भी
 
फिर मेरे दिल का क्या हुआ ... ?
*****
तुम तो नहीं लिख सकते
किसी के प्रेम की शक्ति लिखवा लेती है
 
तो क्या वो मुझसे प्रेम करने लगे है ...

सोमवार, 21 मार्च 2022

लम्हे यादों के ...

 मत तोडना पेड़ की उस टहनी को
जहाँ अब फूल नहीं खिलते
की है कोई ...
जो देता है हिम्मत मेरे होंसले को
की रहा जा सकता है हरा भरा प्रेम के बिना ...
*****
बालकनी के ठीक सामने वाले पेड़ पर
चौंच लड़ाते रहे दो परिंदे बहुत देर तक
फिर उड़ गए अलग-अलग दिशाओं में
हालांकि याद नहीं पिछली बार ऐसा कब हुआ था 
आज तुम बहुत शिद्दत से याद आ रही हो ... 

शनिवार, 12 मार्च 2022

प्रेम ...

प्रेम तो शायद हम दोनों ही करते थे
मैंने कहा ... मेरा प्रेम समुन्दर सा गहरा है

उसने कहा ... प्रेम की पैमाइश नहीं होती
 
अचानक वो उठी ... 

चली गई, वापस न आने के लिए

और मुझे भी समुन्दर का तल नहीं मिला ...

बुधवार, 2 मार्च 2022

हिसाब कुछ लम्हों का ...

जल्द ही ओढ़ लेगा सन्यासी चुनर
की रात का गहराता साया
मेहमान बन के आता है रौशनी के शहर
 
मत रखना हिसाब मुरझाए लम्हों का
स्याह से होते किस्सों का
 
नहीं सहेजना जख्मी यादें
सांसों की कच्ची-पक्की बुग्नी में
 
काट देना उम्र से वो टुकड़े
जहाँ गढ़ी हो दर्द की नुकीली कीलें
और न निकलने वाले काँटों का गहरा एहसास  
 
की हो जाते हैं कुछ अच्छे दिन भी बरबाद
इन सबका हिसाब रखने में
 
वैसे जंगली गुलाब की यादों के बारे में
क्या ख्याल है ...

बुधवार, 23 फ़रवरी 2022

आदत ...

कितनी अच्छी है
भूल जाने की ये आदत
जब भी देखता हूं तुम्हें  
हर बार
नई सी नज़र आती हो
 
पर सुनो ...
तुम मत डालना ये आदत
 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

जंगली गुलाब ...

लम्बे समय से गज़ल लिखते लिखते लग रहा है जैसे मेरा जंगली-गुलाब कहीं खो रहा है ... तो आज एक नई रचना के साथ ... अपने जंगली गुलाब के साथ ...
 
प्रेम क्या डाली पे झूलता फूल है ... 
मुरझा जाता है टूट जाने के कुछ लम्हों में
माना रहती हैं यादें, कई कई दिन ताज़ा
 
फिर सोचता हूँ प्रेम नागफनी क्यों नहीं 
रहता है ताज़ा कई कई दिन, तोड़ने के बाद 
दर्द भी देता है हर छुवन पर, हर बार  
 
कभी लगता है प्रेम करने वाले हो जाते हैं सुन्न  
दर्द से परे, हर सीमा से विलग 
बुनते हैं अपन प्रेम-आकाश, हर छुवन से इतर
 
देर तक सोचता हूँ, फिर पूछता हूँ खुद से
क्या मेरा भी प्रेम-आकाश है ... ? 
कब, कहाँ, कैसे, किसने बुना ...
पर उगे तो हैं, फूल भी नागफनी भी
क्यों ...
 
कसम है तुम्हें उसी प्रेम की
अगर हुआ है कभी मुझसे, तो सच-सच बताना  
प्रेम तो शायद नहीं ही कहेंगे उसे ...
 
तुम चाहो तो जंगली-गुलाब का नाम दे देना ... 

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो ...

मैं रंग मुहब्बत का, थोड़ा सा लगा दूँ तो.
ये मांग तेरी जाना, तारों से सज़ा दूँ तो.
 
तुम इश्क़ की गलियों से, निकलोगे भला कैसे,
मैं दिल में अगर सोए, अरमान जगा दूँ तो.
 
उलफ़त के परिंदे तो, मर जाएंगे ग़श खा कर,
मैं रात के आँचल से, चंदा को उड़ा दूँ तो.
 
मेरी तो इबादत है, पर तेरी मुहब्बत है,
ये राज भरी महफ़िल, में सब को बता दूँ तो.
 
लहरों का सुलग उठना, मुश्किल भी नहीं इतना,
ये ख़त जो अगर तेरे, सागर में बहा दूँ तो.
 
कुछ फूल मुहब्बत के, मुमकिन है के खिल जायें,  
यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो.

(तरही ग़ज़ल)

सोमवार, 31 जनवरी 2022

नहीं तो अजल से यही है फ़साना ...

इसी चापलूसी की सीढ़ी से आना.
बुलंदी की छत पे जो तुमको है जाना.
 
कई बार इन्सानियत गर जगे तो, 
कड़ा कर के दिल से उसे फिर हटाना.
 
भले सच ये तन कर खड़ा सामने हो,
न सोचो दुबारा उसे बस मिटाना.
 
न वादा न यारी न रिश्तों की परवाह,
सिरे से जो एहसान हैं भूल जाना.
 
उठाया है तो क्या गिराना उसे ही,
यही रीत दुनिया की है तुम निभाना.
 
नहीं हैं ये अच्छे नियम ज़िन्दगी के,
करें क्या, है ज़ालिम मगर ये ज़माना.
 
सभी मिल के बदलें तो शायद ये बदलें,
नहीं तो अजल से यही है फ़साना.

शनिवार, 15 जनवरी 2022

परवाज़ परिंदों की अभी बद-हवास है ...

दो बूँद गिरा दे जो अभी उसके पास है,.
बादल से कहो आज मेरी छत उदास है.
 
तबका न कोई चैनो-अमन से है रह रहा,
सुनते हैं मगर देश में अपने विकास है.
 
ज़ख्मी है बदन साँस भी मद्धम सी चल रही,
टूटेगा मेरा होंसला उनको क़यास है.
 
था छेद मगर फिर भी किनारे पे आ लगी,
सागर से मेरी कश्ती का रिश्ता जो ख़ास है.
 
दीवार खड़ी कर दो चिरागों को घेर कर,
कुछ शोर हवाओं का मेरे आस पास है.
 
छिड़का है फिजाओं में लहू जिस्म काट कर,
तब जा के सवेरे का सिन्दूरी लिबास है.
 
कह दो की उड़ानों पे न कब्ज़ा किसी का हो, 
परवाज़ परिंदों की अभी बद-हवास है.