बुधवार, 15 जून 2022

शिव ...

प्रार्थना के कुछ शब्द
जो नहीं पहुँच पाते ईश्वर के पास
बिखर जाते हैं आस्था की कच्ची ज़मीन पर

धीरे धीरे उगने लगते हैं वहाँ कभी न सूखने वाले पेड़
सुना है प्रेम रहता है वहाँ खुशबू बन कर  
वक़्त के साथ जब उतरती हैं कलियाँ
तो जैसे तुम उतर आती हो ईश्वर का रूप ले कर
 
आँखें मुध्ने लगती हैं, हाथ खुद-ब-खुद उठ जाते हैं
उसे इबादत ... या जो चाहे नाम दे देना  
खुशबू में तब्दील हो कर शब्द, उड़ते हैं कायनात में 
 
मैं भी कुछ ओर तेरे करीब आने लगता हूँ 
तू ही तू सर्वत्र ... तुझ में ईश्वर, ईश्वर में तू
उसकी माया, तेरा मोह, चेतन, अवचेतन
मैं ही शिव
, मैं ही सुन्दर, एकम सत्य जगत का     

23 टिप्‍पणियां:


  1. “मैं ही शिव, मैं ही सुन्दर, एकम सत्य जगत का”
    यही सत्य है और जो सत्य है वही शिव…,गहन भावाभिव्यक्ति ।

    जवाब देंहटाएं
  2. मैं भी कुछ ओर तेरे करीब आने लगता हूँ
    तू ही तू सर्वत्र ... तुझ में ईश्वर, ईश्वर में तू
    उसकी माया, तेरा मोह, चेतन, अवचेतन
    मैं ही शिव, मैं ही सुन्दर, एकम सत्य जगत का

    बहुत सुंदर

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 16 जून 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
  4. सुना है प्रेम रहता है वहाँ खुशबू बन कर
    वक़्त के साथ जब उतरती हैं कलियाँ
    तो जैसे तुम उतर आती हो ईश्वर का रूप ले कर

    प्रार्थना के बिखरे शब्दों से उगता है प्रेम!!!
    अद्भुत भाव
    बहुत ही लाजवाब
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं

  5. तू ही तू सर्वत्र ... तुझ में ईश्वर, ईश्वर में तू
    उसकी माया, तेरा मोह, चेतन, अवचेतन
    मैं ही शिव, मैं ही सुन्दर, एकम सत्य जगत का

    बेहद खूबसूरत सृजन 👌👌

    जवाब देंहटाएं
  6. प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती

    जवाब देंहटाएं
  7. सच है ईश्वर सर्वत्र है जब इसका आभास होता है तो हमें बहुत दूर उधर-उधर भटकने की जरुरत नहीं होती। हम सबके बीच ही ईश्वर विद्यमान रहता है बस हमें उन्हें समझने और देखने की जररत होती है
    बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति दिगम्बर जी।सरलता और सहजता से प्रेम की महिमा बढ़ाती ये रचना प्रेम का उद्दात भाव दर्शाती है।सच में अपनसही रूप में नज़र ना आकर भी ईश्वर किसी अपने ही समकक्ष किसी इन्सान को हमारे जीवन में भेज देता है।और यदि प्रार्थना के स्वर परम सत्ता तक ना पहुंचें तो कभी ना सूखने वाले वृक्ष उग ही नही सकते।वह तो कण कण में व्याप्त है।एक अत्यंत सार्थक और मार्मिक सराहनीय रचना के लिए बधाई और शुभकामनाएं आपको

    जवाब देंहटाएं
  9. प्रार्थना के कुछ शब्द
    जो नहीं पहुँच पाते ईश्वर के पास
    बिखर जाते हैं आस्था की कच्ची ज़मीन पर
    धीरे धीरे उगने लगते हैं वहाँ कभी न सूखने वाले पेड़////👌👌👌🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
  10. एहसासों का मंजुल समर्पित भाव।
    सुंदर कोमल सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत ही सुंदर सृजन।
    कोमल भावों से सजी प्रेम का एहसास में पगी प्रार्थना।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत ही अर्थदर्शी अभिव्यक्ति, वाह वाह!

    जवाब देंहटाएं
  13. मैं ही शिव मैं ही सत्य ,सुंदर रचना लगी यह

    जवाब देंहटाएं
  14. ईश्वर सर्वत्र है...जिसने अपने प्रेम में ही पा लिया...उसे कहीं भटकने की ज़रूरत नहीं पड़ती...नासवा जी हमेशा की तरह...अनुपम कृति...👏👏👏

    जवाब देंहटाएं
  15. वाह ,.. ऐसे शब्द जो कभी न सूखने वाले पेड़ बन जाते हैं ,फूल और खुशबू के रूप में बदल जाते हैं उनमें ईश्वर स्वयं ही आ बसते हैं .

    जवाब देंहटाएं
  16. वक़्त के साथ जब उतरती हैं कलियाँ तो जैसे तुम उतर आती हो ईश्वर का रूप लेकर। मन को छू गई आपकी यह रचना दिगंबर जी। यह कोई साधारण काव्य- सृजन नहीं, कुछ ऐसा है जो एक दृष्टि में सरल प्रतीत होता है लेकिन गूढ़ार्थ लिए हुए है।

    जवाब देंहटाएं
  17. I think this is one of the most significant info for me. And I'm glad reading your article.

    जवाब देंहटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है