गुरुवार, 28 जुलाई 2022

कुछ एहसास ...

कुनमुनी धूप का एहसास
जब अनायास ही बदलने लगे मौसम
समझ लेना दूर कहीं यादों में
स्पर्श किया है मैंने तुम्हारा


माथे पे गिरी एक आवारा बूँद
जगाने लगे एक अनजानी प्यास
समझ लेना तन्हाई के किसी लम्हे ने
अंगड़ाई ली है कहीं


हर मौसम में खिलता जंगली गुलाब
तेरे होंटों की मुस्कुराहट लिए
महक रहा है पुरानी पगडण्डी पर
चल आज वहीं टहल आएँ …
जोड़ लें कुछ ताज़ा लम्हे, यादों की बुगनी में …

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 18 जुलाई 2022

इंतज़ार - एक प्रेम का ...

मालुम है ले गया था तुम्हारे होठों की खिलखिलाती हँसी
वो खनकते कंगन, नीले आसमानी रँगों वाली काँच की चूड़ियाँ
वो टूटी पाजेब ... धागे के सहारे जिसे पांवों में अटका रखा था तुमने
 
हर वो शै जिसमें तुम्हारे होने का एहसास हो सकता था
मेरे ट्रंक में सहेज दी थी तुमने
अगर सही सही कहूँ ... तो ले आया था मैं उसे ... 
 
मैं जानता था जुदाई का वो पल इक उम्र से लम्बा होने वाला है
 
पर सच कहूँ तो उस दौर में एक पल भी तुमसे जुदा नही था
हालांकि छोड़ आया था तुम्हे तन्हा सबके बीच यादों के सहारे
 
अब जबकि लौट रहा हूँ तुम्हारे करीब,   
चाहता हूं तमान खुशियाँ समेत दूँ तुम्हारे दामन में ...
 
भर ली है लाल डिबिया में सुबह की लाली, माँग सजाने के लिए
कैद कर ली ही बारिशों की बूँदों में नहाते परिंदों की खनकती हँसी
माँग लिया है शाम का गहरा नीला आँचल,
रात की काली चादर पे चमकते तारे और इन्द्र-धनुष के सुनहरी रँग
ध्यान से देखना पूरब की और खुलने वाली खिड़की की जानिब
घिरने लगी होंगी कुछ आँधियाँ वहाँ ...
की भेजा है हवा के हाथ इक संदेसा तुम्हारे नाम
 
हाँ वो ढेर सारा प्यार भी इकठ्ठा है जो जोड़ रहा हूँ तबसे
जब जुदा हुए थे ज़िन्दगी के फ़र्ज़ पूरा करने को
 
मैं आउँगा छत के उसी सुनसान कोने में
खड़ी होगी जहाँ तुम होठ चबाती मेरे इंतज़ार में ...

#जंगली_गुलाब 

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

दास्ताँ - एक प्रेम की

जिन टेढ़े-मेढ़े रस्तों से गुजारते हैं चरवाहे
जहाँ की मेढों पे खिलते हैं गहरे लाल रंग के जंगली फूल
जहाँ धूप के साथ उतरती है कच्ची सरसों की खुशबू
उसी के पास खेतों से आती है चूडियों की खनक 
और तुम्हारी हँसी की आवाज़ में घुलती पाजेब की धीमी छन-छन
 
रख दिए हैं ताज़ा बोसे उस पगडण्डी के ठीक बीचों बीच 
जिसके एक कोने पे एक छत है और कुछ टूटी हुई दीवारें  
मकान हो जाने की इंतज़ार में 
गुज़र जाते हैं कुछ परिंदे भी उस पगडण्डी की रेत पर
छोड़ जाते हैं पन्जों के गहरे निशान
 
बूढ़े किसान की आशा नहीं देखती रेत का समुन्दर  
और उसके आगे झिलमिलाता पानी का सैलाब
वो देखती है रेत के ठीक ऊपर दमकता काला बादल
रेत का सीना चीर के आती नमी का इंतज़ार है उसे
 
इंतज़ार तो मुझे भी है कुछ बूँदों का
उगे हुए हैं कुछ सूखे झाड़ बरसों से मेरे सूने आँगन में
फूल हो जाने की इंतज़ार में ...
गुज़र के गए हैं कुछ सैनिक अभी-अभी इस रस्ते से
भारी जूतों से धरती का सीना मसलते
सुना है आज़ाद करनी है सूखी मिट्टी, भूमि-पुत्रों से
लाल पट्टी सरों पे बांधे कर रहे हैं लाल जो सूखी धरती का आनन
कुछ नहीं होता है जिनके पास खोने को  
लुटी हुई इज्ज़त और आँखों से निकलते शोलों के सिवा
 
घास के तिनकों से बने हरे कंगन पहने हाथ 
मचलते तो जरूर होंगे बन्दूक हो जाने की इंतज़ार में
प्रेम तो उन्हें भी होता होगा ... मेरी तरह
और प्रेम के फूल पनपने के लिए हवा पानी ज़रूरी तो नहीं     
#जंगली
_गुलाब

शनिवार, 2 जुलाई 2022

प्रेम और तर्क

उस दिन आकाश में नहीं उगे तारे
तुम खड़ी रहीं बहुत देर तक उन्हें देखने की जिद्द में
 
तारों की जिद्द ... नहीं उगेंगे तुम्हारे सामने
नहीं करनी थी उन्हें बात तुम्हारे सामने  
और नहीं मंज़ूर था उन्हें दिगंबर हो जाना
उठा देना किसी के आवारा प्रेम से पर्दा
 
तर्क करने वालों ने सोचा
शोलों से लपकती तुम्हारी रौशनी की ताब
धुंधला न कर दे उन तारों को
तर्क वाले कहां समझते हैं दिल की बातें, प्रेम का मकसद 
 
जब उठने लगता है रात का गहरा आवरण  
और तुम भी आ जाती हो कमरे के भीतर
शीतल चांदनी तले पनपने लगता है एहसास का मासूम बूटा
 
आज रात सोएँगे नहीं तारे
मौका मिले तो ज़रूर देख आना आसमान पर 
जिद्द है उनकी मिट जाने की ... सुबह होने तक 

#जंगली_गुलाब