शनिवार, 27 अगस्त 2022

एब-इनीशियो ...

क्या ऐसा होता है  
कुछ कदम किसी के साथ चले
फिर भूल गए उस हम-कदम को ज़िन्दगी भर के लिए ...
 
कुछ यादें जो उभर आई हों ज़हन में
गुम हो जाएँ चुपचाप जैसे रात का सपना ...
 
चेहरे पर उभरी कुछ झुर्रियाँ
गायब हो जाएँ यक-ब-यक जैसे जवानी का लौटना
 
उम्र का मोड़ जहाँ बस अतीत ही होता है हमसफ़र
सब कुछ हो जाए “एब-इनीशियो” ...
“जैसे कुछ हुआ ही नहीं”
 
सोचता हूँ कई कभी ...
उम्र के उस एक पढ़ाव पर “अल्ज़ाइमर” उतना भी बुरा नहीं ...   

15 टिप्‍पणियां:

  1. यादें धुधलाना अच्छा है वैसे ही जैसे दाग अच्छे हैं टाईप । सुन्दर।

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  2. वाह!दिगंबर जी ,बहुत खूब ! समय के साथ कुछ यादें धुंधला जाती है और कुछ और भी गहरी हो जाती हैं । अल्जाईमर हो जाए तो बात अलग है।

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  3. आपकी लिखी रचना सोमवार 29 अगस्त 2022 को
    पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    संगीता स्वरूप

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  4. सोचने वाली बात है, वैसे जानते-बूझते हुए भी कोई यादों से किनारा करना सीख जाए तो बात ही कुछ और है

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  5. बहुत अच्छी सोच है सर। थोडा भूलना भी ठीक रहता है।

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  6. सोचता हूँ कई कभी ...
    उम्र के उस एक पढ़ाव पर “अल्ज़ाइमर” उतना भी बुरा नहीं। ...गहन विचार करने वाली प्रस्तुति ।

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  7. उम्र के साथ कुछ- कुछ भूल जाना अच्छा ही है वैसे तो😊

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  8. वाह , ....चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं

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  9. जी दिगम्बर जी,इन्सान खुद कुछ भूल जाये ये बेहतर है पर जब अपना कोई अल्जाइमर के रूप में किसी स्मृति लोप का शिकार हो जाता है तो दिल को असहनीय पीड़ा की अनुभूति होती है।हाँ जीवन में कुछ मर्मांतक और तकलीफदेह चीजों से किनारा कर लिया जाये तो बेहतर।एक सन्वेदनशील प्रस्तुति के लिए आभार और बधाई 🙏🙏

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  10. क्या ऐसा होता है
    कुछ कदम किसी के साथ चले
    फिर भूल गए उस हम-कदम को ज़िन्दगी भर के लिए ...
    संभव तो नहीं हाँ अभिनय जरूर कर सकते हैं भूलने का...अल्जाइमर भी अच्छा है उन यादों के लिए जो टीस भर दें मन में...
    हमेशा की तरह बहुत ही लाजवाब
    वाह!!!

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