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सोमवार, 17 अगस्त 2020

एक बुग्नी फूल सूखा डायरी ...

धूप कहती है निकल के दें दें
रौशनी हर घर को चल के दें दें  

साहूकारों की निगाहें कह रहीं
दाम पूरे इस फसल के दें दें

तय अँधेरे में तुम्हें करना है अब
जुगनुओं का साथ जल के दें दें

बात वो सच की करेगा सोच लो
आइना उनको बदल के दें दें

फैंसला लहरों को अब करना है ये
साथ किश्ती का उछल के दे ... दें

सच है मंज़िल पर गलत है रास्ता
रास्ता रस्ता बदल के दे ... दें

एक बुग्नी, फूल सूखा, डायरी  
सब खज़ाने हैं ये कल के दे ... दें

सोमवार, 25 जून 2018

हवा ने दिन को सजा दिया है ...


ये दाव खुद पे लगा दिया है
तुम्हारे ख़त को जला दिया है

तुम्हारी यादों की ईंट चुन कर 
मकान पक्का करा दिया है

जहाँ पे टूटा था एक सपना
वहीँ पे पौधा उगा दिया है

शहर में लौटे थे जिसकी खातिर
उसी ने हमको भुला दिया है

समझ रहा था “का” खुद को अब तक 
“ख” आईने ने बता दिया है

गुज़रते लम्हों को हंस के जीना 
हमें किसी ने सिखा दिया है

उड़ा के काले घने से बादल 
हवा ने दिन को सजा दिया है

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

इस शहर की शांति तो भंग है ...

नाम पर पूजा के ये हुड़दंग है
इस शहर की शांति तो भंग है

लूटता है आस्था के नाम पर 
अब कमाने का निराला ढंग है

हर कोई आठों पहर है भागता  
जिंदगी जैसे के कोई जंग है

घर का दरवाज़ा तो चौड़ा है बहुत
दिल का दरवाज़ा अगरचे तंग है

आइना काहे उसे दिखलाए हैं
उड़ गया चेहरे का देखो रंग है

युद्ध अपना खुद ही लड़ते हैं सभी
जिंदगी में कौन किसके संग है

रविवार, 26 जुलाई 2015

चुभते हैं इस कदर से तेरी याद के नश्तर ...

जो लोग आज खून मिटाने नहीं देते
रस्ता वही तो मिल के बनाने नहीं देते

कुछ लोग जो गुनाह की खेती के हैं माहिर
इंसानियत की फसल उगाने नहीं देते

जागीर आसमां को समझने लगे अपनी
परवाज़ पंछियों को लगाने नहीं देते

करते हैं सच के साथ की तो पैरवी अक्सर
पर आईने को सच भी दिखाने नहीं देते

खुद दोस्ती की आड़ में हैं घौंपते खंजर
पर दुश्मनों से हाथ मिलाने नहीं देते

जो तीरगी की कैद में रहने के हैं आदी
घर जुगनुओं को रात में आने नहीं देते

चुभते हैं इस कदर से तेरी याद के नश्तर
नाकाम दौरे-इश्क भुलाने नहीं देते