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मंगलवार, 25 सितंबर 2018

माँ ...


सच कहूं तो हर साल २५ सितम्बर को ही ज़हन में तेरे न होने का ख्याल आता है, अन्यथा बाकी दिन यूँ लगता है जैसे तू साथ है ... बोलती, उठती, सोती, डांटती, बात करती, प्यार करती ... और मुझे ही क्यों ... शायद सबके साथ ऐसा होता होगा ... माँ का एहसास जो है ... पिछले छह सालों में जाने कितनी बार कितनी ही बातों, किस्सों और लम्हों में तुझे याद किया, तुझे महसूस किया ... ऐसा ही एक एहसास जिसको जिया है सबने ...

मेज़ पर सारी किताबों को सजा देती थी माँ
चार बजते ही सुबह पढने उठा देती थी माँ  

वक़्त पे खाना, समय पे नींद, पढना खेलना
पेपरों के दिन तो कर्फ्यू सा लगा देती थी माँ

दूध घी पर सबसे पहले नाम होता था मेरा
रोज़ सरसों तेल की मालिश करा देती थी माँ

शोर थोड़ा सा भी वो बर्दाश करती थी नहीं  
घर में अनुशासन सभी को फिर सिखा देती थी माँ  

आज भी है याद वो गुज़रा हुआ बचपन मेरा
पाठ हर लम्हे में फिर मुझको पढ़ा देती थी माँ

खुद पे कम, मेहनत पे माँ की था भरोसा पर मुझे 
रोज आँखों में नए सपने जगा देती थी माँ

सोमवार, 30 जुलाई 2018

हम धुंए के बीच तेरे अक्स को तकते रहे ...


हम उदासी के परों पे दूर तक उड़ते रहे
बादलों पे दर्द की तन्हाइयाँ लिखते रहे

गर्द यादों की तेरी सेंडिल से घर आती रही

हम तेरा कचरा उठा कर घर सफा करते रहे


तुम बुझा कर प्यास चल दीं लौट कर देखा नहीं  
हम मुनिस्पेल्टी के नल से बारहा रिसते रहे

कागज़ी फोटो दिवारों से चिपक कर रह गई 
और हम चूने की पपड़ी की तरह झड़ते रहे

जबकि तेरा हर कदम हमने हथेली पर लिया
बूट की कीलों सरीखे उम्र भर चुभते रहे

था नहीं आने का वादा और तुम आईं नहीं
यूँ ही कल जगजीत की गज़लों को हम सुनते रहे

बिजलियें, न बारिशें, ना बूँद शबनम की गिरी
रात छत से टूटते तारों को हम गिनते रहे

कुछ बड़े थे, हाँ, कभी छोटे भी हो जाते थे हम
शैल्फ में कपड़ों के जैसे बे-सबब लटके रहे

उँगलियों के बीच इक सिगरेट सुलगती रह गई
हम धुंए के बीच तेरे अक्स को तकते रहे

सोमवार, 23 जुलाई 2018

तुम जो सच कहने का फिर वादा करो ...


नफरतों की डालियाँ काटा करो
घी सभी बातों पे ना डाला करो 

गोपियों सा बन सको तो बोलना
कृष्ण मेरे प्यार को राधा करो

तुम भी इसकी गिर्द में आ जाओगे
यूँ अंधेरों को नहीं पाला करो

दुःख हमेशा दिल के अंदर सींचना
सुख जो हो मिल जुल के सब साझा करो

खिड़कियों के पार है ताज़ा हवा
धूल यादों की कभी झाड़ा करो

मैं भी अपने झूठ कह दूंगा सभी 
तुम जो सच कहने का फिर वादा करो

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कुछ दराज़ों में डाल रक्खी हैं ...


चूड़ियाँ कुछ तो लाल रक्खी हैं
जाने क्यों कर संभाल रक्खी हैं

जिन किताबों में फूल थे सूखे
शेल्फ से वो निकाल रक्खी हैं 

हैं तो ये गल्त-फहमियाँ लेकिन
चाहतें दिल में पाल रक्खी हैं

बे-झिझक रात में चले आना
रास्तों पर मशाल रक्खी हैं

वो नहीं पर निशानियाँ उनकी
यूँ ही बस साल साल रक्खी हैं

चिट्ठियाँ कुछ तो फाड़ दीं हमनें  
कुछ दराज़ों में डाल रक्खी हैं

सोमवार, 2 जुलाई 2018

दरख्तों से कई लम्हे गिरेंगे ...


किसी की याद के मटके भरेंगे
पुराने रास्तों पे जब चलेंगे

कभी मिल जाएं जो बचपन के साथी
गुज़रते वक़्त की बातें करेंगे

गए टूटी हवेली पर, यकीनन
दिवारों से कई किस्से झरेंगे

जो रहना भीड़ में तनहा न रहना
किसी की याद के बादल घिरेंगे

दिये ने कान में चुपके से बोला
हवा से हम भला कब तक डरेंगे

जो तोड़े मिल के कुछ अमरुद कच्चे 
दरख्तों से कई लम्हे गिरेंगे

सोमवार, 18 जून 2018

बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए ...


सूरज खिला तो धूप के साए मचल गए
कुछ बर्फ के पहाड़ भी झट-पट पिघल गए

तहजीब मिट गयी है नया दौर आ गया
इन आँधियों के रुख तो कभी के बदल गए

जोशो जुनून साथ था किस्मत अटक गई
हम साहिलों के पास ही आ कर फिसल गए

झूठे परों के साथ कहाँ तक उड़ोगे तुम
मंज़िल अभी है दूर ये सूरज भी ढल गए

निकले तो कितने लोग थे अपने मुकाम पर
पहुंचे वही जो वक़्त के रहते संभल गए

मजबूरियों की आड़ में सब कुछ लिखा लिया 
बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए

सोमवार, 11 जून 2018

साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो ...


जीत मेरी हो न तेरी हार हो
जो सही है बस वही हरबार हो

रात ने बादल के कानों में कहा
हट जरा सा चाँद का दीदार हो

नाव उतरेगी सफीनों से तभी
हाथ में लहरों के जब पतवार हो

है मुझे मंज़ूर हर व्योपार पर
पाँच ना हो दो जमा दो, चार हो

मौत है फिर भी नदी का ख्वाब है
बस समुन्दर ही मेरा घरबार हो

इक नया इतिहास लिख दूंगा सनम
साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो

सोमवार, 28 मई 2018

बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं ...


होठ दांतों में दबाना तो नहीं
यूँ ही कुछ कहना सुनाना तो नहीं

आप जो मसरूफ दिखते हो मुझे
गम छुपाने का बहाना तो नहीं

एक टक देखा हँसे फिर चल दिए
सच कहो, ये दिल लगाना तो नहीं

पास आना फिर सिमिट जाना तेरा
प्रेम ही है ना, सताना तो नहीं

कप से मेरे चाय जो पीती हो तुम
कुछ इशारों में बताना तो नहीं

सच में क्या इग्नोर करती हो मुझे
ख्वामखा ईगो दिखाना तो नहीं

इक तरफ झुकना झटकना बाल को
उफ्फ, अदा ये कातिलाना तो नहीं

रात भर "चैटिंग" सुबह की ब्लैंक काल
प्रेम ही था "मैथ" पढ़ाना तो नहीं

कुछ तो था अकसर करा करतीं थीं तुम 
बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं


मंगलवार, 22 मई 2018

दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी ...


दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी
लौट के इस शहर आओ साब जी

कश पे कश छल्लों पे छल्ले उफ़ वो दिन
विल्स की सिगरेट पिलाओ साब जी

मैस की पतली दाल रोटी, पेट फुल
पान कलकत्ति खिलाओ साब जी

मेज मैं फिर से बजाता हूँ चलो
तुम रफ़ी के गीत गाओ साब जी

क्यों न मिल के छत पे बचपन ढूंढ लें
कुछ पतंगें तुम उडाओ साब जी

लिख तो ली थी पर सुना न पाए थे
वो ग़ज़ल तो गुनगुनाओ साब जी

तब नहीं झिझके तो अब क्या हो गया
रेत से सीपी उठाओ साब जी

याद है ठर्रे के बोतल, उल्टियां
फिर से वो किस्सा सुनाओ साब जी

सीप, रम्मी, तीन पत्ती, रात भर 
फिर से गंडोला खिलाओ साब जी

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली ...


जाने किसने भेजी है पर मुझको तो बे-नाम मिली
आज सुबह दरवाज़ा खोला तो अख़बार के नीचे से
यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली

टूटी निब, पेन्सिल के टुकड़े, साइकिल की टूटी गद्दी
दागी कंचे, गोदे लट्टू, चरखी से लिपटी सद्दी
छुट्टी के दिन सुबह से लेकर रात तलक की कुछ बातें
बीते काल-खंड की छाया अनायास बे-दाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

दंगल, मेले, नौटंकी की खुशियों में डूबी बस्ती
हाथ से चलने वाले लकड़ी के झूलों की वो मस्ती
दद्दा के कंधे से देखी रावण की जलती हस्ती
दिल के गहरे तहखाने से जाने किसके नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

पीठ मिली जो पिट्ठू की गेंदों से सिक के लाल हुई
गिल्ली जो डंडे के हाथों पिट-पिट कर बेहाल हुई
छोटी बेरी के काँटों से दर्द में डूबी इक ऊँगली 
भूतों की आवाजों वाली इक कुटिया बदनाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

धूप मिली जो घर के आँगन में अकसर आ जाती थी
गाय मिली जो बासी रोटी छिलके सब खा जाती थी
वो कौवा जो छीन के रोटी हाथों से उड़ जाता था
फिर अतीत से उड़ कर मैना कोयल मेरे नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

कुछ अपनी जानी पहचानी अपनी ही आवाज़ मिली
ताल मिलाती मेज, तालियाँ, सपनों की परवाज़ मिली
टूटे शेर, अधूरी नज्में, आँखों में गुजरी रातें
फिर किताब के पीले पन्नों पर अटकी इक शाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

राम से ज्यादा लखन के नाम ये बनवास है ...


जिनके जीवन में हमेशा प्रेम है, उल्लास है
दर्द जितना भी मिले टिकता नहीं फिर पास है  

दूसरों के घाव सिलने से नहीं फुर्सत जिन्हें
अपने उधड़े ज़ख्म का उनको कहाँ आभास है

होठ चुप हैं पर नज़र को देख कर लगता है यूँ
दिल धड़कता है मेरा शायद उन्हें एहसास है

दिन गुज़रते ही जला लेते हैं अपने जिस्म को
जुगनुओं का रात से रिश्ता बहुत ही ख़ास है

आंधियां उस मोड़ से गुज़रीं थी आधी रात को
दीप लेकिन जल रहे होंगे यही विश्वास है

सिरफिरे लोगों का ही अंदाज़ है सबसे जुदा
पी के सागर कह रहे दिल में अभी भी प्यास है 

हों भले ही राम त्रेता युग के नायक, क्या हुआ 
राम से ज़्यादा लखन के नाम ये बनवास है

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

कुछ ख़त हमारी याद के पन्नों से धुल गए ...

लम्हे जो गुम हुए थे दराजों में मिल गए 
दो चार दिन सुकून से अपने निकल गए

डट कर चुनौतियों का किया सामना मगर
दो आंसुओं के वार से पल भर में हिल गए

दुश्मन के तीर पर ही ये इलज़ाम रख दिया
किस किस को कहते यार के खंज़र से छिल गए 

इतिहास बन गए जो समय पर चले नहीं 
बहते रहे दरिया तो समुंदर से मिल गए

कहते थे आफ़ताब पे रखते हैं नियन्त्रण
कल रात माहताब के हाथों जो जल गए

तो क्या हुआ जो होठ पे ताला लगा लिया
आँखों से आपके तो कई राज़ खुल गए

अल्जाइमर है या के तकाज़ा है उम्र का
कुछ ख़त हमारी याद के पन्नों से धुल गए

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

बचा कर के टांगें निकलना पड़ेगा ...

नया वर्ष आने वाला है ... सभी मित्रों को २०१८ की बहुत बहुत शुभकामनाएं ... २०१७ की अच्छी यादों के साथ २०१८ का स्वागत है ... 

ये किरदार अपना बदलना पड़ेगा
जो जैसा है वैसा ही बनना पड़ेगा

ये जद्दोजहद ज़िन्दगी की कठिन है
यहाँ अपने लोगों को डसना पड़ेगा

बहुत भीड़ है रास्तों पर शिखर के
किसी को गिरा कर के चलना पड़ेगा

कभी बाप कहना पड़ेगा गधे को
कभी पीठ पर उसकी चढ़ना पड़ेगा

अलहदा जो दिखना है इस झुण्ड में तो  
नया रोज़ कुछ तुमको करना पड़ेगा

यहाँ खींच लेते हैं अपने ही अकसर 
बचा कर के टांगें निकलना पड़ेगा 

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

रो रही हैं आज क्यों फिर पुतलियाँ ...

छत भिगोने आ गईं जो बदलियाँ
शोर क्यों करती हैं इतना बिजलियाँ

आदमी शहरों के ऐसे हो गए
चूस कर छोड़ी हों जैसे गुठलियाँ

फेर में कानून के हम आ गए
अब कराहेंगी हमारी पसलियाँ

हाथ में आते ही सत्ता क्या हुआ
पी गईं सागर को खुद ही मछलियाँ

उँगलियों की चाल, डोरी का चलन
जानती हैं खेल सारा पुतलियाँ

खुल गया टांका पुराने दर्द का 
रो रही हैं आज क्यों फिर पुतलियाँ 

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

या फिर हमें भी इक चराग़ लेने दो ...

फूलों की कैद से पराग लेने दो
इन तितलियों से कुछ सुराग लेने दो

इस दौड़ में कहीं पिछड़ न जाएं हम
मंजिल अभी है दूर भाग लेने दो

राजा हो रंक पेट तो सताएगा
उनको भी तो चूल्हे से आग लेने दो

नज़दीक वो कभी नज़र न आएंगे
सोए हुए हैं शेर जाग लेने दो

हम आस्तीन में छुपा के रख लेंगे
इस शहर में हमको भी नाग लेने दो 

या जुगनुओं को छोड़ दो यहाँ कुछ पल 
या फिर हमें भी इक चराग़ लेने दो  

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने ...

लहू का रंग है यकसाँ कहा शमशीर भालों ने
लगा डाली है फिर भी आग बस्ती के दलालों ने 

यकीनन दूर है मंज़िल मगर मैं ढूंढ ही लूंगा
झलक दिखलाई है मुझको अँधेरे में उजालों ने

वो लड़की है तो माँ के पेट में क्या ख़त्म हो जाए 
झुका डाली मेरी गर्दन कुछ ऐसे ही सवालों ने

अलग धर्मों के भूखे नौजवानों का था कुछ झगड़ा
खबर दंगों की झूठी छाप दी अख़बार वालों ने

हवा भी साथ बेशर्मी से इनका दे रही है अब
शहर के हुक्म से जंगल जला डाला मशालों ने

वो अपना था पराया था वो क्या कुछ ले के भागा है 
कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने 

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

रँग चुके हैं यहाँ सब तेरे रंग में ...

अपने मन मोहने सांवले रंग में
श्याम रँग दो हमें सांवरे रंग में

मैं ही अग्नि हूँ जल पृथ्वी वायु गगन
आत्मा है अजर सब मेरे रंग में

ओढ़ कर फिर बसंती सा चोला चलो
आज धरती को रँग दें नए रंग में

थर-थराते लबों पर सुलगती हंसी
आओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में

आसमानी दुपट्टा छलकते नयन
सब ही मदहोश हैं मद भरे रंग में

रंग भगवे में रँगता हूँ दाड़ी तेरी
तुम भी चोटी को रँग दो हरे रंग में

जाम दो अब के दे दो ज़हर साकिया  
रँग चुके हैं यहाँ सब तेरे रंग में 

(तरही गज़ल - पंकज सुबीर जी के मुशायरे में लिखी, जो दिल के 
हमेशा करीब रहती है)  

सोमवार, 20 नवंबर 2017

हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे ...

हम बुज़ुर्गों के चरणों में झुकते रहे
पद प्रतिष्ठा के संजोग बनते रहे

वो समुंदर में डूबेंगे हर हाल में 
नाव कागज़ की ले के जो चलते रहे

इसलिए बढ़ गईं उनकी बदमाशियाँ
हम गुनाहों को बच्चों के ढकते रहे

आश्की और फकीरी खुदा का करम
डूब कर ज़िन्दगी में उभरते रहे

धूप बारिश हवा सब से महरूम हैं
फूल घर के ही अंदर जो खिलते रहे

साल के दो दिनों को मुक़र्रर किया
देश भक्ति के गीतों को सुनते रहे

दोस्तों की दुआओं में कुछ था असर 
हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे

सोमवार, 13 नवंबर 2017

ये कहानी भी सुनानी, है अभी तक गाँव में ...

बस वही मेरी निशानी, है अभी तक गाँव में
बोलता था जिसको नानी, है अभी तक गाँव में

खंडहरों में हो गई तब्दील पर अपनी तो है  
वो हवेली जो पुरानी, है अभी तक गाँव में

चाय तुलसी की, पराठे, मूफली गरमा गरम
धूप सर्दी की सुहानी, है अभी तक गाँव में

याद है घुँघरू का बजना रात के चोथे पहर
क्या चुड़ेलों की कहानी, है अभी तक गाँव में ?

लौट के आऊँ न आऊँ पर मुझे विश्वास है
जोश, मस्ती और जवानी, है अभी तक गाँव में

दूर रह के गाँव से इतने दिनों तक क्या किया   
ये कहानी भी सुनानी, है अभी तक गाँव में 

(तरही गज़ल - पंकज सुबीर जी के मुशायरे में लिखी, जो दिल के 
हमेशा करीब है)