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सोमवार, 17 दिसंबर 2018

यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ...


खेत, पीपल, घर, कुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा

कूदना तैयार हो जो सौ प्रतीशत
भूल जाना की नया अवसर मिलेगा

इस शहर में ढूंढना मुमकिन नहीं है
चैन से सोने को इक बिस्तर मिलेगा

देर तक चाहे शिखर के बीच रह लो
चैन धरती पर तुम्हे आकर मिलेगा

बैठ कर देखो बुजुर्गों के सिरहाने
उम्र का अनुभव वहीं अकसर मिलेगा

मन से मानोगे तो खुद झुक जाएगा सर 
यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

थमा गई थी वो ख़त हाथ में मेरे फट से ...


कहाँ से आई कहाँ चूम के गई झट से 
शरारती सी थी तितली निकल गई ख़ट से

हसीन शोख़ निगाहों में कुछ इशारा था 
न जाने कौन से पल आँख दब गई पट से

ज़मीं पे आग के झरने दिखाई देते हैं  
गिरी है बूँद सुलगती हुयी तेरी लट से

डरा हुआ सा शहर है, डरे हुए पंछी 
डरा हुआ सा में खुद भी हूँ अपनी आहट से

लगे थे सब तो छुडाने में हाथ पर बिटिया
ज़रूरतों में बुढापे की ले गई हट से

नहीं थे सेर, सवा सेर से, मिले अब तक
उड़े जो हाथ के तोते समझ गए चट से

न जाने कौन थी, रिश्ता था क्या मेरा, फिर भी 
थमा गई थी वो ख़त हाथ में मेरे फट से

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

क्यों है ये संसार अपने दरम्याँ ...


क्यों जुड़े थे तार अपने दरम्याँ
था नहीं जब प्यार अपने दरम्याँ

रात बोझिल, सलवटें, खामोश दिन
बोझ सा इतवार अपने दरम्याँ

प्रेम, नफरत, लम्स, कुछ तो नाम दो
क्या है ये हरबार अपने दरम्याँ

मैं खिलाड़ी, तुम भी शातिर कम नहीं
जीत किसकी हार अपने दरम्याँ

छत है साझा फांसला मीलों का क्यों
क्या है कारोबार अपने दरम्याँ

सिलसिला रीति, रिवाजो-रस्म का 
क्यों है ये संसार अपने दरम्याँ

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

सजाई महफिलें जो प्रेम की खामोश पायल ने ...


सजाई महफिलें जो प्रेम की खामोश पायल ने
मधुर वंशी बजा दी नेह की फिर श्याम श्यामल ने

शिकायत क्या करूँ इस खेल में मैं भी तो शामिल हूँ
मेरी नींदों को छीना है किसी मासूम काजल ने

वो मिलते ही हकीकत हर किसी की जान लेता है
मचा रक्खी है कैसी खलबली उस एक पागल ने

मुकम्मल जानने को क्यों तुम्हें हर बात हो मालुम 
पके हैं या के हैं कच्चे बता दी एक चावल ने

फलक तो मिल गया लेकिन कसक सी रह गयी दिल में
न जाने क्यों मेरा रस्ता नहीं रोका है बादल ने

सितम, दुःख दर्द, मुश्किल राह में जितनी चली आएं 
बलाओं से बचा रक्खा है मुझको माँ के आँचल ने

सोमवार, 12 नवंबर 2018

एक प्रतिमा विशाल भी होगी ...


खेत होंगे कुदाल भी होगी
लहलहाती सी डाल भी होगी

धूप के इस तरह मुकरने में
कुछ तो बादल की चाल भी होगी

गौर से इसकी थाप को सुनना
बूँद के साथ ताल भी होगी

जोर से बोल दें अगर पापा
पूछने की मजाल भी होगी

सब्जी, रोटी के साथ है मीठा 
आज डब्बे में दाल भी होगी

उनकी यादों के अध-जले टुकड़े
आसमानी सी शाल भी होगी

यूँ उजाला नज़र नहीं आता
चुप सी जलती मशाल भी होगी

प्रेम जीता हो दिल में तो अकसर
एक प्रतिमा विशाल भी होगी 

सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

हम तुझे सिगरेट समझ कर फूंकते ही रह गए ...


अध-लिखे कागज़ किताबों में दबे ही रह गए
कुछ अधूरे ख़त कहानी बोलते ही रह गए

शाम की आगोश से जागा नहीं दिन रात भर
प्लेट में रक्खे परांठे ऊंघते ही रह गए

रेलगाड़ी सा ये जीवन दौड़ता पल पल रहा
खेत, खम्बे, घर जो छूटे, छूटते ही रह गए

सिलवटों ने रात के किस्से कहे तकिये से जब 
बल्ब पीली रौशनी के जागते ही रह गए

सुरमई चेहरा, पसीना, खुरदरे हाथों का “टच” 
ज़िन्दगी बस एक लम्हा, देखते ही रह गए

पल उबलती धूप के जब पी रही थी दो-पहर
हम तेरे बादल तले बस भीगते ही रह गए

तुम धुंए के साथ मेरी ज़िन्दगी पीती रहीं 
हम तुझे सिगरेट समझ कर फूंकते ही रह गए

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

माँ ...


सच कहूं तो हर साल २५ सितम्बर को ही ज़हन में तेरे न होने का ख्याल आता है, अन्यथा बाकी दिन यूँ लगता है जैसे तू साथ है ... बोलती, उठती, सोती, डांटती, बात करती, प्यार करती ... और मुझे ही क्यों ... शायद सबके साथ ऐसा होता होगा ... माँ का एहसास जो है ... पिछले छह सालों में जाने कितनी बार कितनी ही बातों, किस्सों और लम्हों में तुझे याद किया, तुझे महसूस किया ... ऐसा ही एक एहसास जिसको जिया है सबने ...

मेज़ पर सारी किताबों को सजा देती थी माँ
चार बजते ही सुबह पढने उठा देती थी माँ  

वक़्त पे खाना, समय पे नींद, पढना खेलना
पेपरों के दिन तो कर्फ्यू सा लगा देती थी माँ

दूध घी पर सबसे पहले नाम होता था मेरा
रोज़ सरसों तेल की मालिश करा देती थी माँ

शोर थोड़ा सा भी वो बर्दाश करती थी नहीं  
घर में अनुशासन सभी को फिर सिखा देती थी माँ  

आज भी है याद वो गुज़रा हुआ बचपन मेरा
पाठ हर लम्हे में फिर मुझको पढ़ा देती थी माँ

खुद पे कम, मेहनत पे माँ की था भरोसा पर मुझे 
रोज आँखों में नए सपने जगा देती थी माँ

सोमवार, 30 जुलाई 2018

हम धुंए के बीच तेरे अक्स को तकते रहे ...


हम उदासी के परों पे दूर तक उड़ते रहे
बादलों पे दर्द की तन्हाइयाँ लिखते रहे

गर्द यादों की तेरी सेंडिल से घर आती रही

हम तेरा कचरा उठा कर घर सफा करते रहे


तुम बुझा कर प्यास चल दीं लौट कर देखा नहीं  
हम मुनिस्पेल्टी के नल से बारहा रिसते रहे

कागज़ी फोटो दिवारों से चिपक कर रह गई 
और हम चूने की पपड़ी की तरह झड़ते रहे

जबकि तेरा हर कदम हमने हथेली पर लिया
बूट की कीलों सरीखे उम्र भर चुभते रहे

था नहीं आने का वादा और तुम आईं नहीं
यूँ ही कल जगजीत की गज़लों को हम सुनते रहे

बिजलियें, न बारिशें, ना बूँद शबनम की गिरी
रात छत से टूटते तारों को हम गिनते रहे

कुछ बड़े थे, हाँ, कभी छोटे भी हो जाते थे हम
शैल्फ में कपड़ों के जैसे बे-सबब लटके रहे

उँगलियों के बीच इक सिगरेट सुलगती रह गई
हम धुंए के बीच तेरे अक्स को तकते रहे

सोमवार, 23 जुलाई 2018

तुम जो सच कहने का फिर वादा करो ...


नफरतों की डालियाँ काटा करो
घी सभी बातों पे ना डाला करो 

गोपियों सा बन सको तो बोलना
कृष्ण मेरे प्यार को राधा करो

तुम भी इसकी गिर्द में आ जाओगे
यूँ अंधेरों को नहीं पाला करो

दुःख हमेशा दिल के अंदर सींचना
सुख जो हो मिल जुल के सब साझा करो

खिड़कियों के पार है ताज़ा हवा
धूल यादों की कभी झाड़ा करो

मैं भी अपने झूठ कह दूंगा सभी 
तुम जो सच कहने का फिर वादा करो

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कुछ दराज़ों में डाल रक्खी हैं ...


चूड़ियाँ कुछ तो लाल रक्खी हैं
जाने क्यों कर संभाल रक्खी हैं

जिन किताबों में फूल थे सूखे
शेल्फ से वो निकाल रक्खी हैं 

हैं तो ये गल्त-फहमियाँ लेकिन
चाहतें दिल में पाल रक्खी हैं

बे-झिझक रात में चले आना
रास्तों पर मशाल रक्खी हैं

वो नहीं पर निशानियाँ उनकी
यूँ ही बस साल साल रक्खी हैं

चिट्ठियाँ कुछ तो फाड़ दीं हमनें  
कुछ दराज़ों में डाल रक्खी हैं

सोमवार, 2 जुलाई 2018

दरख्तों से कई लम्हे गिरेंगे ...


किसी की याद के मटके भरेंगे
पुराने रास्तों पे जब चलेंगे

कभी मिल जाएं जो बचपन के साथी
गुज़रते वक़्त की बातें करेंगे

गए टूटी हवेली पर, यकीनन
दिवारों से कई किस्से झरेंगे

जो रहना भीड़ में तनहा न रहना
किसी की याद के बादल घिरेंगे

दिये ने कान में चुपके से बोला
हवा से हम भला कब तक डरेंगे

जो तोड़े मिल के कुछ अमरुद कच्चे 
दरख्तों से कई लम्हे गिरेंगे

सोमवार, 18 जून 2018

बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए ...


सूरज खिला तो धूप के साए मचल गए
कुछ बर्फ के पहाड़ भी झट-पट पिघल गए

तहजीब मिट गयी है नया दौर आ गया
इन आँधियों के रुख तो कभी के बदल गए

जोशो जुनून साथ था किस्मत अटक गई
हम साहिलों के पास ही आ कर फिसल गए

झूठे परों के साथ कहाँ तक उड़ोगे तुम
मंज़िल अभी है दूर ये सूरज भी ढल गए

निकले तो कितने लोग थे अपने मुकाम पर
पहुंचे वही जो वक़्त के रहते संभल गए

मजबूरियों की आड़ में सब कुछ लिखा लिया 
बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए

सोमवार, 11 जून 2018

साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो ...


जीत मेरी हो न तेरी हार हो
जो सही है बस वही हरबार हो

रात ने बादल के कानों में कहा
हट जरा सा चाँद का दीदार हो

नाव उतरेगी सफीनों से तभी
हाथ में लहरों के जब पतवार हो

है मुझे मंज़ूर हर व्योपार पर
पाँच ना हो दो जमा दो, चार हो

मौत है फिर भी नदी का ख्वाब है
बस समुन्दर ही मेरा घरबार हो

इक नया इतिहास लिख दूंगा सनम
साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो

सोमवार, 28 मई 2018

बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं ...


होठ दांतों में दबाना तो नहीं
यूँ ही कुछ कहना सुनाना तो नहीं

आप जो मसरूफ दिखते हो मुझे
गम छुपाने का बहाना तो नहीं

एक टक देखा हँसे फिर चल दिए
सच कहो, ये दिल लगाना तो नहीं

पास आना फिर सिमिट जाना तेरा
प्रेम ही है ना, सताना तो नहीं

कप से मेरे चाय जो पीती हो तुम
कुछ इशारों में बताना तो नहीं

सच में क्या इग्नोर करती हो मुझे
ख्वामखा ईगो दिखाना तो नहीं

इक तरफ झुकना झटकना बाल को
उफ्फ, अदा ये कातिलाना तो नहीं

रात भर "चैटिंग" सुबह की ब्लैंक काल
प्रेम ही था "मैथ" पढ़ाना तो नहीं

कुछ तो था अकसर करा करतीं थीं तुम 
बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं


मंगलवार, 22 मई 2018

दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी ...


दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी
लौट के इस शहर आओ साब जी

कश पे कश छल्लों पे छल्ले उफ़ वो दिन
विल्स की सिगरेट पिलाओ साब जी

मैस की पतली दाल रोटी, पेट फुल
पान कलकत्ति खिलाओ साब जी

मेज मैं फिर से बजाता हूँ चलो
तुम रफ़ी के गीत गाओ साब जी

क्यों न मिल के छत पे बचपन ढूंढ लें
कुछ पतंगें तुम उडाओ साब जी

लिख तो ली थी पर सुना न पाए थे
वो ग़ज़ल तो गुनगुनाओ साब जी

तब नहीं झिझके तो अब क्या हो गया
रेत से सीपी उठाओ साब जी

याद है ठर्रे के बोतल, उल्टियां
फिर से वो किस्सा सुनाओ साब जी

सीप, रम्मी, तीन पत्ती, रात भर 
फिर से गंडोला खिलाओ साब जी

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली ...


जाने किसने भेजी है पर मुझको तो बे-नाम मिली
आज सुबह दरवाज़ा खोला तो अख़बार के नीचे से
यादों की खुशबू से महकी इक चिट्ठी गुमनाम मिली

टूटी निब, पेन्सिल के टुकड़े, साइकिल की टूटी गद्दी
दागी कंचे, गोदे लट्टू, चरखी से लिपटी सद्दी
छुट्टी के दिन सुबह से लेकर रात तलक की कुछ बातें
बीते काल-खंड की छाया अनायास बे-दाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

दंगल, मेले, नौटंकी की खुशियों में डूबी बस्ती
हाथ से चलने वाले लकड़ी के झूलों की वो मस्ती
दद्दा के कंधे से देखी रावण की जलती हस्ती
दिल के गहरे तहखाने से जाने किसके नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

पीठ मिली जो पिट्ठू की गेंदों से सिक के लाल हुई
गिल्ली जो डंडे के हाथों पिट-पिट कर बेहाल हुई
छोटी बेरी के काँटों से दर्द में डूबी इक ऊँगली 
भूतों की आवाजों वाली इक कुटिया बदनाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

धूप मिली जो घर के आँगन में अकसर आ जाती थी
गाय मिली जो बासी रोटी छिलके सब खा जाती थी
वो कौवा जो छीन के रोटी हाथों से उड़ जाता था
फिर अतीत से उड़ कर मैना कोयल मेरे नाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

कुछ अपनी जानी पहचानी अपनी ही आवाज़ मिली
ताल मिलाती मेज, तालियाँ, सपनों की परवाज़ मिली
टूटे शेर, अधूरी नज्में, आँखों में गुजरी रातें
फिर किताब के पीले पन्नों पर अटकी इक शाम मिली
यादों की खुशबू से महकी ...

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

राम से ज्यादा लखन के नाम ये बनवास है ...


जिनके जीवन में हमेशा प्रेम है, उल्लास है
दर्द जितना भी मिले टिकता नहीं फिर पास है  

दूसरों के घाव सिलने से नहीं फुर्सत जिन्हें
अपने उधड़े ज़ख्म का उनको कहाँ आभास है

होठ चुप हैं पर नज़र को देख कर लगता है यूँ
दिल धड़कता है मेरा शायद उन्हें एहसास है

दिन गुज़रते ही जला लेते हैं अपने जिस्म को
जुगनुओं का रात से रिश्ता बहुत ही ख़ास है

आंधियां उस मोड़ से गुज़रीं थी आधी रात को
दीप लेकिन जल रहे होंगे यही विश्वास है

सिरफिरे लोगों का ही अंदाज़ है सबसे जुदा
पी के सागर कह रहे दिल में अभी भी प्यास है 

हों भले ही राम त्रेता युग के नायक, क्या हुआ 
राम से ज़्यादा लखन के नाम ये बनवास है