देश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
देश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 9 सितंबर 2019

एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ ...


मैं कई गन्जों को कंघे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ

काटता हूँ मूछ पर दाड़ी भी रखता 
और माथे के तिलक तो साथ रखता  
नाम अल्ला का भी शंकर का हूँ लेता
है मेरा धंधा तमन्चे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

धर्म का व्यापार मुझसे पल रहा है
दौर अफवाहों का मुझसे चल रहा है  
यूँ नहीं तो शह्र सारा जल रहा है
चौंक पे हर बार झगड़े बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

एक ही गोदाम में है माल सारा  
गाड़ियाँ, पत्थर, के झन्डा हो के नारा
हर गली, नुक्कड़ पे सप्लाई मिलेगी    
टोपियों के साथ चमचे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

हर विपक्षी का कहा लिखता रहा हूँ  
जो कहे सरकार मैं जपता रहा हूँ
मैं ही टी.वी., मीडिया, अख़बार नेट मैं
यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ 
एक सौदागर हूँ ...

सोमवार, 13 अगस्त 2018

भीड़ जयचंदों की क्यों फिर देश से जाती नहीं है ...


सभी भारत वासियों को स्वतंत्रता दिवस, १५ अगस्त की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ ... एक छोटा सा आग्रह इस गीत के माध्यम से:  

हो गए टुकड़े अनेकों चेतना जागी नहीं है
क्या तपोवन में कहीं सिंह गर्जना बाकी नहीं है

था अतिथि देव भव का भाव अपना दिव्य चिंतन
पर सदा लुटते रहे इस बात पर हो घोर मंथन  
चिर विजय की कामना क्यों मन को महकाती नहीं है

संस्कृति के नाम पर कब तक हमें छलते रहेंगे
हम अहिंसा के पुजारी हैं तो क्या पिटते रहेंगे
क्या भरत भूमि अमर वीरों की परिपाटी नहीं है

खंड में बंटती रही माँ भारती लड़ते रहे हम
प्रांत भाषा वर्ण के झगड़ों में बस उलझे रहे हम
राष्ट्र की परिकल्पना क्यों सोच में आती नहीं है

सैनिकों के शौर्य को जब कायरों से तोलते हैं
नाम पर अभिव्यक्ति की हम शत्रु की जय बोलते हैं 
भीड़ जयचंदों की क्यों फिर देश से जाती नहीं है

सोमवार, 28 अगस्त 2017

माँ सामने खड़ी है मचल जाइए हुजूर ...

बहरों का है शहर ये संभल जाइए हुजूर
क्यों कह रहे हैं अपनी गज़ल जाइए हुजूर

बिखरे हुए जो राह में पत्थर समेट लो 
कुछ दूर कांच का है महल जाइए हुजूर

जो आपकी तलाश समुन्दर पे ख़त्म है
दरिया के साथ साथ निकल जाइए हुजूर

क्यों बात बात पर हो ज़माने को कोसते
अब भी समय है आप बदल जाइए हुज़ूर

मुद्दों की बात पर न कभी साथ आ सके
अब देश पे बनी है तो मिल जाइए हुजूर

हड्डी गले की बन के अटक जाएगी कभी 
छोटी सी मछलियां हैं निगल जाइए हुजूर

बूढ़ी हुई तो क्या है उठा लेगी गोद में 
माँ सामने खड़ी है मचल जाइए हुजूर