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बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

सबको बच कर रहना है जय चन्दों से ...


बस इतना कहना है देश के बन्दों से
सबको बच कर रहना है जय चन्दों से

राजनीति जो करते हैं बलिदानों पर
ढूंढ के उनको घर के बाहर कर देना
गद्दारों का साथ सदा जो देते हैं 
कान खोल कर मेरी बातें सुन लेना 
और नहीं कुछ और नहीं अब सहना है
सबको बच कर रहना है ...  

सीमाओं पे देश की सैनिक डटे हुए
कफ़न बाँध कर मुस्तैदी से खड़े हुए  
घर के भीतर सजग रहे हम सब इतना
थर थर कांपे शत्रु सारे डरे हुए
नहीं जरूरी संग धार के बहना है
सबको बच कर रहना है ...
 
प्रेम, अहिंसा, ज्ञान हमारी पूँजी है
जो भी हमसे मांगोगे हम दे देंगे
मगर तोड़ने वालों इतना सुन लेना
अपने माथे का चंदन हम ले लेंगे
काश्मीर तो देश का सुन्दर गहना है
सबको बच कर रहना है ...

सोमवार, 20 नवंबर 2017

हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे ...

हम बुज़ुर्गों के चरणों में झुकते रहे
पद प्रतिष्ठा के संजोग बनते रहे

वो समुंदर में डूबेंगे हर हाल में 
नाव कागज़ की ले के जो चलते रहे

इसलिए बढ़ गईं उनकी बदमाशियाँ
हम गुनाहों को बच्चों के ढकते रहे

आश्की और फकीरी खुदा का करम
डूब कर ज़िन्दगी में उभरते रहे

धूप बारिश हवा सब से महरूम हैं
फूल घर के ही अंदर जो खिलते रहे

साल के दो दिनों को मुक़र्रर किया
देश भक्ति के गीतों को सुनते रहे

दोस्तों की दुआओं में कुछ था असर 
हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे

सोमवार, 14 अगस्त 2017

सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे ...

सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ-कामनाएं ... इस पावन पर्व की पूर्व संध्या पर आज के हालात पे लिखी गज़ल प्रस्तुत है ... आशा है सबका स्नेह मिलता रहेगा ...

जब तलक नापाक हरकत शत्रु की सहते रहेंगे
देश की सीमाओं पर सैनिक सदा मरते रहेंगे

पत्थरों से वार कर उक्सा रहे हैं देश-द्रोही
और कब तक हम अहिंसा मार्ग पर चलते रहंगे

मानता हूँ सिर के बदले सिर नहीं क़ानून अपना 
पर नहीं स्वीकार अपने वीर यूँ कटते रहेंगे

दक्ष हो कर आज फिर प्रतिशोध तो लेना पड़ेगा
सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे

एक ही आघात में अब क्यों नहीं कर दें बराबर 
शांति चर्चा, वार्ताएं बाद में करते रहेंगे