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सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

साक्षात्कार ब्रह्म से ...

ढूंढता हूँ बर्फ से ढंकी पहाड़ियों पर
उँगलियों से बनाए प्रेम के निशान
मुहब्बत का इज़हार करते तीन लफ्ज़
जिसके साक्षी थे मैं और तुम
और चुप से खड़े देवदार के कुछ ऊंचे ऊंचे वृक्ष    

हाँ ... तलाश है बोले हुए कुछ शब्दों की 
जिनको पकड़ने की कोशिश में
भागता हूँ सरगोशियों के इर्द-गिर्द
दौड़ता हूँ पहाड़ पहाड़, वादी वादी

सुना है लौट कर आती हैं आवाजें
ब्रह्म रहता है सदा के लिए कायनात में 
श्रृष्टि में बोला शब्द शब्द

हालांकि मुश्किल नहीं उस लम्हे में लौटना   
पर चाहत का कोई अंत नहीं 

उम्र की ढलान पे 
अतीत के पन्नों में लौटने से बेहतर है 
साक्षात ब्रह्म से साक्षात्कार करना  

बुधवार, 19 जुलाई 2017

यादें ... बस यादें

यादें यादें यादें ... क्या आना बंद होंगी ... काश की रूठ जाएँ यादें ... पर लगता तो नहीं और साँसों तक तो बिलकुल भी नहीं ... क्यों वक़्त जाया करना ...

मिट्टी की
कई परतों के बावजूद
हलके नहीं होते
कुछ यादों की निशान
हालांकि मूसलाधार बारिश के बाद
साफ़ हो जाता है आसमान

साफ़ हो जाती हैं
गर्द की पीली चादर ओढ़े
हरी हरी मासूम पत्तियां

साफ़ हो जाती हैं
उदास घरों की टीन वाली छतें

ओर ... ये काली सड़क भी
रुकी रहती है जो
तेरे लौटने के इंतज़ार में

इंतज़ार है जो ख़त्म नहीं होता
जंगली गुलाब है 
जो खिलता बंद नहीं करता