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सोमवार, 20 जुलाई 2020

हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे


ज़िन्दगी में हैं कई लोग आग हों जैसे
हर अँधेरे में सुलगते हैं जुगनुओं जैसे

सोच लेता हूँ कई बार बादलों जैसे
भीग लेने दूं किसी छत को बारिशों जैसे

बैठे बैठे भी कई बार चौंक जाता हूँ
दिल में रहते हैं कई लोग हादसों जैसे

हम सफ़र बन के मेरे साथ वो नहीं तो क्या
मील दर मील खड़े हैं वो पत्थरों जैसे   

दिल के गहरे में कई दर्द रोज़ उठते हैं
भूल जाता हूँ में हर बार मुश्किलों जैसे

लोग ऐसे भी मेरी ज़िन्दगी में आए हैं
खिलते रहते हैं हमेशा जो तितलियों जैसे

सरसरी सी ही नज़र डालना कभी हम पर
हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे

सोमवार, 25 नवंबर 2019

हमारी नाव को धक्का लगाने हाथ ना आए ...


लिखे थे दो तभी तो चार दाने हाथ ना आए
बहुत डूबे समुन्दर में खज़ाने हाथ ना आए

गिरे थे हम भी जैसे लोग सब गिरते हैं राहों में
यही है फ़र्क बस हमको उठाने हाथ ना आए

रकीबों ने तो सारा मैल दिल से साफ़ कर डाला
समझते थे जिन्हें अपना मिलाने हाथ ना आए

सभी बचपन की गलियों में गुज़र कर देख आया हूँ
कई किस्से मिले साथी पुराने हाथ ना आए

इबादत घर जहाँ इन्सानियत की बात होनी थी
वहाँ इक नीव का पत्थर टिकाने हाथ ना आए

सितारे हद में थे मुमकिन उन्हें मैं तोड़ भी लेता  
मुझे दो इन्च भी ऊँचा उठाने हाथ ना आए

यही फुट और दो फुट फाँसला साहिल से बाकी था 
हमारी नाव को धक्का लगाने हाथ ना आए

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ...


खेत, पीपल, घर, कुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा

कूदना तैयार हो जो सौ प्रतीशत
भूल जाना की नया अवसर मिलेगा

इस शहर में ढूंढना मुमकिन नहीं है
चैन से सोने को इक बिस्तर मिलेगा

देर तक चाहे शिखर के बीच रह लो
चैन धरती पर तुम्हे आकर मिलेगा

बैठ कर देखो बुजुर्गों के सिरहाने
उम्र का अनुभव वहीं अकसर मिलेगा

मन से मानोगे तो खुद झुक जाएगा सर 
यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा

सोमवार, 5 सितंबर 2016

हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों ...

उग रहे बारूद खन्जर इन दिनों
हो गए हैं खेत बन्जर इन दिनों

चौकसी करती हैं मेरी कश्तियाँ
हद में रहता है समुन्दर इन दिनों

आस्तीनों में छुपे रहते हैं सब
लोग हैं कितने धुरन्धर इन दिनों

आदतें इन्सान की बदली हुईं
शहर में रहते हैं बन्दर इन दिनों

आ गए पत्थर सभी के हाथ में
हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों

रविवार, 12 जुलाई 2015

सोच लो ताज हो न ये सर का ...

रास्ता जब तलाशने निकले
खुद के क़दमों को नापने निकले

रोक लेते जो रोकना होता
हम तो थे सब के सामने निकले

जिंदगी दांव पे लगा डाली
इश्क में हम भी हारने निकले

कब से पसरा हुआ है सन्नाटा
चीख तो कोई मारने निकले

चाँद उतरा है झील में देखो
लोग पत्थर उछालने निकले

सोच लो ताज हो न ये सर का
तुम जो बोझा उतारने निकले