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सोमवार, 18 जून 2018

बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए ...


सूरज खिला तो धूप के साए मचल गए
कुछ बर्फ के पहाड़ भी झट-पट पिघल गए

तहजीब मिट गयी है नया दौर आ गया
इन आँधियों के रुख तो कभी के बदल गए

जोशो जुनून साथ था किस्मत अटक गई
हम साहिलों के पास ही आ कर फिसल गए

झूठे परों के साथ कहाँ तक उड़ोगे तुम
मंज़िल अभी है दूर ये सूरज भी ढल गए

निकले तो कितने लोग थे अपने मुकाम पर
पहुंचे वही जो वक़्त के रहते संभल गए

मजबूरियों की आड़ में सब कुछ लिखा लिया 
बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए

सोमवार, 19 मार्च 2018

समय - एक इरेज़र ... ?


यादें यादें यादें ... क्यों आती हैं ... कब आती हैं ... कैसे आती हैं ... जरूरी है यादों की यादों में रहना ... या साँसों  का हिसाब रखना ... या फिर जंगली गुलाब का याद रखना ...

सांसों के सिवा
मुसलसल कुछ नहीं जिंदगी में
वैसे तिश्नगी भी मुसलसल होती है
जब तक तू नहीं होती

पतझड़ का आना बेसबब नहीं 
सूखे पत्तों के चटखने की आवाज़ से
कितनी मिलती जुलती है
तेरी हंसी की खनक  

यादें आएं इसलिए ज़रूरी है
किसी का चले जाना जिंदगी से
हालाँकि नहीं भरते समय की तुरपाई से
कुछ यादों के हल्के घाव भी

कोरे कैनवस में रंग भरने के लिए 
जैसे ज़रूरी है यादों का सहारा
उतना ही ज़रूरी है 
अपने आप से बातें करना

अज़ाब बन के आती हैं जंगली गुलाब की यादें 
समय वो इरेज़र नहीं जो मिटा सके ...

सोमवार, 12 मार्च 2018

सफ़र जो आसान नहीं ...


बेतहाशा फिसलन की राह पर
काम नहीं आता मुट्ठियों से घास पकड़ना  
सुकून देता है उम्मीद के पत्थर से टकराना
या रौशनी का लिबास ओढ़े अंजान टहनी का सहारा 
थाम लेती है जो वक़्त के हाथ 

चुभने के कितने समय बाद तक
वक़्त का महीन तिनका 
घूमता रहता है दर्द का तूफानी दरिया बन कर
पाँव में चुभा छोटा सा लम्हा
शरीर छलनी होने पे ही निकल पाता है

अभी सुख की खुमारी उतरी भी नहीं होती 
आ जाती है दुःख की नई लहर
आखरी पाएदान पे जो खड़ी होती है सुख के  

हर आग की जलन एक सी 
किसी ठहरे हुवे सवाल की तरह
लम्हों की राख रह जाती है जगह जगह इतिहास समेटे
हाथ लगते ही ख्वाब टूट जाता है
सवाल खड़ा रहता है

उम्मीद का उजाला
आँखों का काजल बन के नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद
किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को

किसी साए के सहारे भी तो जिंदगी नहीं चलती

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

साक्षात्कार ब्रह्म से ...

ढूंढता हूँ बर्फ से ढंकी पहाड़ियों पर
उँगलियों से बनाए प्रेम के निशान
मुहब्बत का इज़हार करते तीन लफ्ज़
जिसके साक्षी थे मैं और तुम
और चुप से खड़े देवदार के कुछ ऊंचे ऊंचे वृक्ष    

हाँ ... तलाश है बोले हुए कुछ शब्दों की 
जिनको पकड़ने की कोशिश में
भागता हूँ सरगोशियों के इर्द-गिर्द
दौड़ता हूँ पहाड़ पहाड़, वादी वादी

सुना है लौट कर आती हैं आवाजें
ब्रह्म रहता है सदा के लिए कायनात में 
श्रृष्टि में बोला शब्द शब्द

हालांकि मुश्किल नहीं उस लम्हे में लौटना   
पर चाहत का कोई अंत नहीं 

उम्र की ढलान पे 
अतीत के पन्नों में लौटने से बेहतर है 
साक्षात ब्रह्म से साक्षात्कार करना  

सोमवार, 15 जनवरी 2018

समय ...

तपती रेत के टीलों से उठती आग
समुन्दर का गहरा नीला पानी
सांप सी बलखाती “शेख जायद रोड़”
कंक्रीट का इठलाता जंगल

सभी तो रोज नज़र आते थे रुके हुवे  
मेरे इतने करीब की मुझे लगा  
शायद वक़्त ठहरा हुवा है मेरे साथ   

ओर याद है वो “रिस्ट-वाच” 
“बुर्ज खलीफा” की बुलंदी पे तुमने उपहार में दी थी
कलाई में बंधने के बाजजूद
कभी बैटरी नहीं डली थी उसमें मैंने  
वक्त की सूइयां
रोक के रखना चाहता था मैं उन दिनों 

गाड़ियों की तेज रफ़्तार
सुबह से दोपहर शाम फिर रात का सिलसिला
हवा के रथ पे सवार आसमान की ओर जाते पंछी
कभी अच्छा नहीं लगा ये सब मुझे ...
वक्त के गुजरने का एहसास जो कराते थे

जबकि मैं लम्हों को सदियों में बदलना चाहता था
वक़्त को रोक देना चाहता था
तुम्हारे ओर मेरे बीच एक-टक
स्तब्ध, ग्रुत्वकर्षण मुक्त 
टिक टिक से परे, धडकन से इतर
एक लम्हा बुनना चाहता था

लम्हों को बाँध के रखने की इस जद्दोजेहद में 
उम्र भी कतरा कतरा पिघल गई 

फिर तुम भी तो साथ छोड़ गयीं थी ... 

शेख जायद रोड - दुबई की एक मशहूर सड़क
बुर्ज खलीफा - अभी तक की दुनिया में सबसे ऊंची इमारत दुबई की

बुधवार, 3 जनवरी 2018

उम्र के छलावे ...

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक मंगल कामनाएं ... २०१८ सबके लिए शुभ हो. नव वर्ष की शुरुआत एक रचना के साथ ... जाने क्यों अभी तक ब्लॉग पे नहीं डाली ... अगर आपके दिल को भी छू सके तो लिखना सार्थक होगा ...

तेरे चले जाने के बाद
पतझड़ की तरह कुछ पत्ते डाल से झड़ने लगे थे  
गमले में लगी तुलसी भी सूखने लगी थी
हालांकि वो आत्महत्या नहीं थी

वो तेरे स्पर्श का आभाव भी नही था   
क्योंकि समय के साथ कोने में पड़े कैक्टस पे फूल आने लगे थे
दावा तो नहीं कर सकता की वो खुशी के नहीं थे  

छत पे उतरी सीलन
जैसे कोरे कैनवस पे अजीबो-गरीब रेखाओं में बना तेरा अक्स  
जानता हूँ अगली बारिश से पहले छत की मरम्मत ज़रूरी है

ड्रैसिंग टेबल से सारी चीजें फिकवाने के बावजूद
नए रूम फ्रेशनर का कोई असर नहीं हो रहा
तेरे ब्रैंड के डीयो की खुशबू झड़ती है दिवारों से 
लगता है अगले साल घर की सफेदी भी करवानी होगी

पिछले कई दिनों से
बीते लम्हों की काई जमने लगी है फर्श पर 
टूटी टाइलों की झिर्रियों से यादों की बास उठने लगी है
लगता है अगली गर्मियों से पहले ये मार्बल भी बदलना होगा  

और इस खिड़की, रोशनदान का क्या करूं
पल्लों की ओट से लुका छिपी का खेल खेलते अब साँस फूलने लगी है 
तेरे होने का एहसास बार बार खिड़की के मुहाने ले आता है 
लगता है अगले साल तक इन्हें भी बंद करवाना होगा

और कोने में पड़ा आदम कद टैडी-बियर
वो भी पिछले कई दिनों से उदास है
तेरे चले जाने के बाद मैं उससे लिपट के सोने लगा था
अजीब सी जिस्मानी गंध रहती है उसमें
गहरे लाल लिपस्टिक के निशानों से अटा वो टैडी-बियर  
सोचता हूँ अबकी सर्दियों से पहले गरम कपड़ों के साथ
इसको भी ड्राई-क्लीन करवा लूँ

सच कहूं तो इतना कुछ है करने के लिए
समझ नहीं आता कहाँ से शुरुआत करूं ...
हाथ की लकीरों में उम्र की लकीर देख के हंसी आने लगी है अब
अपने आप से बातें करना सकून देने लगा है 

पता नहीं ये खुद से किये वादे हैं या जिंदगी के छलावे ... 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

वक़्त ज़िंदगी और नैतिकता ...

क्या सही क्या गलत ... खराब घुटनों के साथ रोज़ चलते रहना ज़िंदगी की जद्दोजहद नहीं दर्द है उम्र भर का ... एक ऐसा सफ़र जहाँ मरना होता है रोज़ ज़िंदगी को ... ऐसे में ... सही बताना क्या में सही हूँ ...

फुरसत के सबसे पहले लम्हे में
बासी यादों की पोटली लिए  
तुम भी चली आना टूटी मज़ार के पीछे
सुख दुःख के एहसास से परे
गुज़ार लेंगे कुछ पल सुकून के

की थोड़ा है ज़िंदगी का बोझ  
सुकून के उस एक पल के आगे

कल फिर से ढोना है टूटे कन्धों पर
पत्नी की तार-तार साड़ी का तिरस्कार
माँ की सूखी खांसी की खसक  
पिताजी के सिगरेट का धुंवा
बढ़ते बच्चों की तंदुरुस्ती का खर्च
और अपने लिए ...
साँसों के चलते रहने का ज़रिया  

नैतिकता की बड़ी बड़ी बातों सोचने का 
वक़्त कहाँ देती है ज़िंदगी  

मंगलवार, 27 जून 2017

सुकून ...

सुकून अगर मिल सकता बाज़ार में तो कितना अच्छा होता ... दो किलो ले आता तुम्हारे लिए भी ... काश की पेड़ों पे लगा होता सुकून ... पत्थर मारते भर लेते जेब ... क्या है किसी के पास या सबको है तलाश इसकी ...


नहीं चाहता प्यार करना
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के
अपने आप से किये वादों से परे

उड़ना चाहता हूं उम्मीद के छलावों से इतर
के छू सकूँ आसमां
फिर चाहे न आ सकूँ वापस ज़मीन पर

गिरती पड़ती लहरों के सहारे
जाना चाहता हूं समय की चट्टान के उस पार    
जुड़ती है सीमा नए आकाश की जहाँ    
स्वार्थ से अलग, प्रेम से जुदा
गढ़ सकूँ जहाँ अपने लिए नई दुनिया  
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के 
जंगली गुलाब की यादों से अलग ... 

मंगलवार, 23 मई 2017

वजह ... बे-वजह जिंदगी की ...

सम्मोहन, बदहवासी ... पर किस बात की ... जैसे कुछ पकड़ में नहीं आ रहा ... चेहरे ही चेहरे या सारे मेरे चेहरे ...  फिसल रही हो तुम या मैं या जिंदगी या कुछ और ... सतह कहाँ है ...

बेवजह बातें के लिए 
लंबी रात का होना जरूरी नहीं

मौन का संवाद कभी बेवजह नहीं होता
हालांकि रात
कई कई दिन लंबी हो जाती है

उनको देखा
देखते ही रह गया
इसलिए तो प्यार नहीं होता

प्यार की वजह खोजने में
उम्र कम पड़ जाती है
कुछ समय बाद करने से ज्यादा
वजह जानना जरूरी होने लगता है

हालांकि मुसलसल कुछ नहीं होता
जिंदगी के अंधेरे कूँवे में फिसलते लोगों के सिवा     

नज़र नहीं आ रही पर ज़मीन मिलेगी पैरों को
अगर इस कशमकश में बचे रहे

फिसलन के इस लंबे सफर में
जानी पहचानी बदहवास शक्लें देख कर
मुस्कुराने को जी चाहता है

कितना मिलती जुलती हैं मेरी तस्वीर से ये शक्लें  
ऐसा तो नहीं आइना टूट के बिखरा हो  

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

जिंदगी किताब और आखरी पन्ना ...

क्या सच में जीवन का अन्त नहीं ... क्या जीवन निरंतर है ... आत्मा के दृष्टिकोण से देखो तो शायद हाँ ... पर शरीर के माध्यम से देखो तो ... पर क्या दोनों का अस्तित्व है एक दुसरे के बिना ... छोड़ो गुणी जनों के समझ की बाते हैं अपने को क्या ...   

अचानक नहीं आता
ज़िंदगी की क़िताब का आखरी पन्ना
हां ... कभी कभी
कहानी का अन्त आ जाता है बीच में
कई बार उस अन्त से आगे जाने की इच्छा मर जाती है
पर जीवन चलता रहता है
थके हुए कछुए की रफ़्तार से

कहते हैं लकड़ी पे लगी दीमक
जितना जल्दी हो निकाल देनी चाहिए
और सच पूछो तो यादें भी
नहीं तो झड़ती हैं बुरादे की तरह साँसें ज़िन्दगी से   

अच्छा होता जो खाली रहती ज़िंदगी की किताब
कोरी ... श्वेत धवल अन्त तक

कम से कम आखरी पन्ने की तलाश 
आखरी पन्ने पे ख़त्म होती ...

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

कड़वा सच ...

बिन बोले, बिन कहे भी कितना कुछ कहा जा सकता है ... पर जैसा कहा क्या दूसरा वैसा ही समझता है ... क्या सच के पीछे छुपा सच समझ आता है ... शायद हाँ, शायद ना ... या शायद समझ तो आता है पर समय निकल जाने के बाद ...   

एक टक हाथ देखने के बाद तुमने कहा 
राजा बनोगे या बिखारी

वजह पूछी
तो गहरी उदासी के साथ चुप हो गईं
और मैंने ...
मैंने देखा तुम्हारी आँखों में 
ओर जुट गया सपने बुनने

भूल गया की लकीरों की जगह
हाथों का कठोर होना ज्यादा ज़रुरी है
सपनों के संसार से परे
एक हकीकत की दुनिया भी होती है
जहाँ लकीरें नहीं पत्थर की खुरदरी ज़मीन होती है

जूते पहनने के काबिल होने तक
नंगे पाँव चलना ज़रूरी होता है
गुलाब की चाह काँटों से उलझे बिना परवान नहीं चढ़ती  

ये सच है की सपनों का राजकुमार
मैं कभी का बन गया था
आसान जो था
नज़रें बंद करके सोचना भर था
पर भिखारी बने बिना भी न रह सका
(तुम्हारी तलाश में ठोकरें जो खाता रहता हूं)

सच है ... हाथ की रेखाएं बोलती हैं  ...

सोमवार, 27 मार्च 2017

कहानी प्रेम की? हाँ ... नहीं ...

वो एक ऐहसास था प्रेम का जिसकी कहानी है ये ... जाने किस लम्हे शुरू हो के कहाँ तक पहुंची ... क्या साँसें बाकी हैं इस कहानी में ... हाँ ... क्या क्या कहा नहीं ... तो फिर इंतज़ार क्यों ...

हालांकि छंट गई है तन्हाई की धुंध
समय के साथ ताज़ा धूप भी उगने लगी है  
पर निकलने लगे हैं यादों के नुकीले पत्थर
जहाँ पे कुछ हसीन लम्हों की इब्तदा हुई थी

गुलाम अली की गज़लों से शुरू सिलसिला
शेक्सपीयर के नाटकों से होता हुवा
साम्यवाद के नारों के बीच
समाजवाद की गलियों से गुज़रता
गुलज़ार की नज्मों में उतर आया था

खादी के सफ़ेद कुर्ते ओर नीली जीन के अलावा   
तुम कुछ पहनने भी नहीं देतीं थीं उन दिनों
मेरी बढ़ी हुई दाड़ी ओर मोटे फ्रेम वाले चश्में में
पता नहीं किसको ढूँढती थीं

पढ़ते पढ़ते जब कभी तुम्हें देखता  
दांतों में पेन दबाए मासूम चेहरे को देखता रहता     
नज़रें मिलने पर तुम ऐसे घबरातीं
जैसे कोई चोरी पकड़ी गई   
फिर अचानक मेरा माथा चूम 
कमरे से बाहर
जब ज़ोर ज़ोर से हंसती 
तो आते जातों की नज़रों में
अनगिनत सवाल नज़र आते थे मुझे

मैं तो उन दिनों समझ ही नहीं पाता था
ये प्यार है के कुछ ओर ...
हालांकि मैंने ... दीन दुनिया से बेखबर
सब कुछ बहुत पहले से ही तुम्हारे नाम कर दिया था

फिर वक़्त ने करवट बदली
रोज़ रोज़ का सिलसिला हफ़्तों और महीनों में बदलने लगा
एक जीन ओर कुछ खादी के कुर्तों के सहारे
मैंने तो जिंदगी जीने का निश्चय कर ही लिया था
पर शायद तुम हालात का सामना नहीं कर सकीं

तुम्हारे चले जाने के बाद वो तमाम रास्ते
नागफनी से चुभने लगे थे   
रुके हुवे लम्हों की नमी में काई सी जमने लगी थी
अजीब सी बैचैनी से दम घुटने लगा था

खुद को हालात के सहारे छोड़ने से बैहतर
कोई ओर रास्ता नज़र नहीं आया था मुझे

धीरे धीरे वक़्त के थपेड़ों ने
दर्द के एहसास में खुश रहने का ढब समझा दिया 

मुद्दत बाद आज फिर
उम्र के इस मुकाम पे वक़्त की इस बे-वक्त करवट ने
तेरे शहर की दहलीज पे ला पटका है
तेरी यादों के नुकीले पत्थर दर्द तो दे रहे हैं
पर आज धूप की चुभन
पुराने लम्हों का एहसास लिए
मीठी ठंडक का एहसास दे रही है

क्या तुम भी गुज़रती हो कभी इन लम्हों के करीब से  

सोमवार, 20 मार्च 2017

आज और बस आज ...

मुसलसल रहे आज तो कितना अच्छा ... प्रश्नों में खोए रहना ... जानने का प्रयास करना ... शायद व्यर्थ हैं सब बातें ... जबरन डालनी होती है जीने की आदत आने वाले एकाकी पलों के लिए ... भविष्य की मीठी यादों के लिए  वर्तमान में कुछ खरोंचें डालना ज़रूरी है, नहीं तो समय तो अपना काम कर जाता है ...

जिंदगी क्या है
कई बार सोचने की कोशिश में भटकता है मन
शब्दकोष में लिखे तमाम अर्थ
झड़ने लगते हैं बेतरतीब
और गुजरते वक्त की टिकटिकी
हर पल जोड़ती रहती है नए सफे जिंदगी के अध्याय में

वक्त के पन्नों पर अगर नहीं उकेरा
खट्टी-मीठी यादों का झंझावात
नहीं खींचा कोई नक्शा सुनहरी शब्दों के मायने से  
अगर नहीं डाली आदत वर्तमान में जीने की  

तो इतना ज़रूर याद रखना

जिंदगी के कोरे सफे पर  
समय की स्याही बना देती है जख्मी निशान  
कुछ शैतानी दिमाग गाड़ देते हैं सलीब
रिसते हैं ताज़ा खून के कतरे जहाँ से उम्र भर

ज़रूरी है इसलिए हर अवस्था के वर्तमान को संवारना
पल-पल आज को जीने की आदत बनाना 
ताकि भविष्य में इतिहास की जरूरत न रहे  

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

उजवल भविष्य ...

उम्र के किसी एक पड़ाव पर कितना तंग करने लगती है कोई सोच ... ज़िन्दगी का चलचित्र घूमने लगता है साकार हो के ... पर क्यों ... समय रहते क्यों नहीं जाग पाते हैं हम ... आधुनिकता की दौड़ ... सब कुछ पा लेने की होड़ ... या कुछ और ...

हाथ बढ़ाया तोड़ लिया
इतने करीब तो नहीं होते तारे 

उजवल भविष्य की राह
चौबीस घंटों में अड़तालीस घंटे के सफर से नहीं मिलती
निराशा ओर घोर अन्धकार के बीच
सुकून भरी जिंदगी की चाह
मरुस्थल में मीठे पानी की तलाश से कम नहीं 

जल्दी से जल्दी समेट लेने की भूख
वक़्त को समय से पहले उतार देती है शरीर में   

तेरे बालों में समय से पहले उम्र का उतर आना 
मेरी आँखों का धुंधलापन नहीं था
वो अनुवांशिक असर भी नहीं था
क्योंकि तेरे चेहरे पर सलवटों के निशान उभर आए थे  

वो मेरी समुन्दर पी जाने की चाह थी 
जो ज़ख्म भरने का इंतज़ार भी न कर सकी
रेत को मुट्ठी में रख लेने का वहशीपन
जो समय को भी अपने साथ न रख सका 

भूल गया था की पंखों का नैसर्गिक विकास
लंबे समय तक की उड़ान का आत्म-विश्वास है

क्या समय लौटेगा मेरे पास ...

सोमवार, 30 जनवरी 2017

अहम् ...

रिश्तों में कब, क्यों कुछ ऐसे मोड़ आ जाते हैं की अनजाने ही हम अजनबी दीवार खुद ही खड़ी कर देते हैं ... फिर उसके आवरण में अपने अहम्, अपनी खोखली मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं ... आदमी इतना तो अंजान नहीं होता की सत्य जान न सके ...      

क्योंकि लिपटा था तेरे प्यार का कवच मेरी जिंदगी से
इस चिलचिलाती धूप ने जिस्म काला तो किया  
पर धवल मन को छू भी न सकी
समय की धूल आँधियों के साथ आई तो सही
पर निशान बनाने से पहले हवा के साथ फुर्र हो गई

पर जाने कब कौन से लम्हे पे सवार
अहम् की आंच ने
मन के नाज़ुक एहसास को कोयले सा जला दिया
मेरे वजूद को अंतस से मिटा दिया 

और मैं .....

इस आंच में तुम्हारे पिघलते अस्तित्व को
धुँवा धुँवा होते देखने की चाह में सांस लेने लगा
समय की धूल में तेरा वजूद मिट्टी हो जाने की आस में जीने लगा
पर ये हो न सका
और कब इस आंच में जलता हुवा खुद ही लावा उगलने लगा
जान भी न पाया

और अब .... ये चाहता हूँ
की इससे पहले की जिस्म से उठती ये सडांध जीना दूभर कर दे  
रिश्ते की नाज़ुक डोर समय से पहले टूट जाय
उन तमाम लम्हों को काट दूं
दफ़न कर दूं वो सारे पल जो उग आए थे खरपतवार की तरह
हम दोनों के बीच

हाँ .... मैं आज ये भी स्वीकार करना चाहता हूँ 
ऐसे तमाम लम्हों का अन्वेषण और पोषण मैंने ही किया था ....

रविवार, 25 सितंबर 2016

माँ ...

माँ को गए आज चार साल हो गए पर वो हमसे दूर है शायद ही किसी पल ऐसा लगा ... न सिर्फ मुझसे बल्कि परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य के साथ माँ का जो रिश्ता था वो सिर्फ वही समझ सकता है ... मुझे पूरा यकीन है जब तक साँसें रहेंगी माँ के साथ उस विशेष लगाव को उन्हें भुलाना आसान नहीं होगा ... बस में होता तो आज का दिन कभी ना आने देता पर शायद माँ जानती थी जीवन के सबसे बड़े सत्य का पाठ वही पढ़ा सकती थी ... सच बताना माँ ... क्या इसलिए ही तुम चली गईं ना ...   


ज़िन्दगी की अंजान राहों पर
अब डर लगने लगा है

तुमने ही तो बताया था 
ये कल-युग है द्वापर नहीं  
कृष्ण बस लीलाओं में आते हैं अब
युद्ध के तमाम नियम
दुर्योधन के कहने पर तय होते हैं
देवों के श्राप शक्ति हीन हो चुके हैं
 
मैं अकेला और दूर तक फैली क्रूर नारायणी सेना
हालांकि तेरा सिखाया हर दाव
खून बन के दौड़ता है मेरी रगो में

एक तुम ही तो सारथी थीं
हाथ पकड़ कर ले आईं यहाँ तक
मेरी कृष्ण, मेरी माया
जिसके हाथों सुरक्षित थी मेरी जीवन वल्गा

अकेला तो मैं अब भी हूँ
जिंदगी के ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी हैं हर पल 
और मेरा रथ भी वैसे ही दौड़ रहा है

सच बताना माँ

मेरी जीवन वल्गा अब भी तुम्हारे हाथों में ही है न ...?