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सोमवार, 14 सितंबर 2020

हम धुंवे के बीच तेरे अक्स को तकते रहे ...

हम सवालों के जवाबों में ही बस उलझे रहे , 
प्रश्न अन-सुलझे नए वो रोज़ ही बुनते रहे.

हम उदासी के परों पर दूर तक उड़ते रहे,
बादलों पे दर्द की तन्हाइयाँ लिखते रहे .

गर्द यादों की तेरी “सेंडिल” से घर आती रही,
रोज़ हम कचरा उठा कर घर सफा करते रहे.

तुम बुझा कर प्यास चल दीं लौट कर देखा नहीं,  
हम “मुनिस्पेल्टी” के नल से बारहा रिसते रहे.

कागज़ी फोटो दिवारों से चिपक कर रह गई, 
और हम चूने की पपड़ी की तरह झरते रहे.

जबकि तेरा हर कदम हमने हथेली पर लिया,
बूट की कीलों सरीखे उम्र भर चुभते रहे.

था नहीं आने का वादा और तुम आई नहीं,
यूँ ही कल जगजीत की ग़ज़लों को हम सुनते रहे.

कुछ बड़े थे, हाँ, कभी छोटे भी हो जाते थे हम,
शैल्फ में कपड़ों के जैसे बे-सबब लटके रहे.

उँगलियों के बीच में सिगरेट सुलगती रह गई,
हम धुंवे के बीच तेरे अक्स को तकते रहे.

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं ...


उदासी से घिरी तन्हा छते हैं
कई किस्से यहाँ के घूरते हैं

परिंदों के परों पर घूमते हैं
हम अपने घर को अकसर ढूँढ़ते हैं

नहीं है इश्क पतझड़ तो यहाँ क्यों
सभी के दिल हमेशा टूटते हैं

मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं

नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं

कभी तो राख़ हो जाएँगी यादें
तुम्हे सिगरेट समझ कर फूंकते हैं

लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं

लगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कुछ दराज़ों में डाल रक्खी हैं ...


चूड़ियाँ कुछ तो लाल रक्खी हैं
जाने क्यों कर संभाल रक्खी हैं

जिन किताबों में फूल थे सूखे
शेल्फ से वो निकाल रक्खी हैं 

हैं तो ये गल्त-फहमियाँ लेकिन
चाहतें दिल में पाल रक्खी हैं

बे-झिझक रात में चले आना
रास्तों पर मशाल रक्खी हैं

वो नहीं पर निशानियाँ उनकी
यूँ ही बस साल साल रक्खी हैं

चिट्ठियाँ कुछ तो फाड़ दीं हमनें  
कुछ दराज़ों में डाल रक्खी हैं