सुकून लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुकून लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

कुछ ख़त हमारी याद के पन्नों से धुल गए ...

लम्हे जो गुम हुए थे दराजों में मिल गए 
दो चार दिन सुकून से अपने निकल गए

डट कर चुनौतियों का किया सामना मगर
दो आंसुओं के वार से पल भर में हिल गए

दुश्मन के तीर पर ही ये इलज़ाम रख दिया
किस किस को कहते यार के खंज़र से छिल गए 

इतिहास बन गए जो समय पर चले नहीं 
बहते रहे दरिया तो समुंदर से मिल गए

कहते थे आफ़ताब पे रखते हैं नियन्त्रण
कल रात माहताब के हाथों जो जल गए

तो क्या हुआ जो होठ पे ताला लगा लिया
आँखों से आपके तो कई राज़ खुल गए

अल्जाइमर है या के तकाज़ा है उम्र का
कुछ ख़त हमारी याद के पन्नों से धुल गए

मंगलवार, 27 जून 2017

सुकून ...

सुकून अगर मिल सकता बाज़ार में तो कितना अच्छा होता ... दो किलो ले आता तुम्हारे लिए भी ... काश की पेड़ों पे लगा होता सुकून ... पत्थर मारते भर लेते जेब ... क्या है किसी के पास या सबको है तलाश इसकी ...


नहीं चाहता प्यार करना
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के
अपने आप से किये वादों से परे

उड़ना चाहता हूं उम्मीद के छलावों से इतर
के छू सकूँ आसमां
फिर चाहे न आ सकूँ वापस ज़मीन पर

गिरती पड़ती लहरों के सहारे
जाना चाहता हूं समय की चट्टान के उस पार    
जुड़ती है सीमा नए आकाश की जहाँ    
स्वार्थ से अलग, प्रेम से जुदा
गढ़ सकूँ जहाँ अपने लिए नई दुनिया  
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के 
जंगली गुलाब की यादों से अलग ...