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सोमवार, 21 सितंबर 2020

उफ़ .... तुम भी न

पता है

तुमसे रिश्ता ख़त्म होने के बाद
कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ

सलीके से रहना
ज़ोर से बात न करना
चैहरे पर जबरन मुस्कान रखना
"सॉरी"
"एसक्यूस मी"
भारी भरकम संबोधन से बात करना
"शेव बनाओ"
छुट्टी है तो क्या ...
"नहाओ"
कितना कचरा फैलाते हो
बिना प्रैस कपड़े पहन लेते हो

धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण

उफ्फ ... कितना बोना सा लगने लगा था

अच्छा ही हुआ डोर टूट गई

कितना मुक्त हूँ अब

घर में लगी हर तस्वीर बदल दी है मैने
सोफे की पोज़ीशन भी बदल डाली

फिल्मी गानों के शोर में
अब देर तक थिरकता हूँ
ऊबड़-खाबड़ दाडी में
जीन पहने रहता हूँ

तुम्हारे परफ्यूम की तमाम शीशियाँ
गली में बाँट तो दीं
पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही

और हाँ
वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा ...

सोमवार, 7 सितंबर 2020

उफ़ शराब का क्या होगा ...

सच के ख्वाब का क्या होगा
इन्कलाब का क्या होगा
 
आसमान जो ले आये  
आफताब का क्या होगा
 
तुम जो रात में निकले हो
माहताब का क्या होगा
 
इस निजाम में सब अंधे
इस किताब का क्या होगा
 
मौत द्वार पर आ बैठी
अब हिसाब का क्या होगा
 
साथ छोड़ दें गर कांटे 
फिर गुलाब का क्या होगा
 
है सरूर इन आँखों  में
उफ़ शराब का क्या होगा

सोमवार, 31 अगस्त 2020

तेरा जाना ट्रिगर है यादों का बंधन

सिक्कों का कुछ चाँद सितारों का बंधन.
चुम्बक है पर तेरी बाहों का बंधन.
 
दिन में भी तो चाँद नज़र आ जाता है,
इसने कब माना है रातों का बंधन.
 
तेरी आहट जैसे ही दरवाज़े पर,
खोल दिया बादल ने बूंदों का बंधन.
 
जो करना है अभी करो, बस अभी करो,
किसने जाना कब तक साँसों का बंधन.
 
तुमसे रौनक, तुमसे रोटी, सब्जी, दाल,
वरना ये घर चार दीवारों का बंधन.
 
सूरज की दस्तक को कब तक ठुकराते,
टूट गया सपनों की बातों का बंधन.

कब तक तेरा साथ, वक़्त का पता नहीं,
तेरा जाना ट्रिगर है यादों का बंधन.

सोमवार, 24 अगस्त 2020

कुछ तिलिस्मी थी माँ तेरी झोली

रात जागी तो कान में बोली
इस अँधेरे की अब चली डोली
 
बंद रहना ही इसका अच्छा था
राज़ की बात आँख ने खोली
 
दोस्ती आये तो मगर कैसे
दुश्मनी की गिरह नहीं खोली
 
तब से चिढती है धूप बादल से
नींद भर जब से दो-पहर सो ली
 
तब भी रोई थी मार के थप्पड़
आज माँ याद कर के फिर रो ली
 
खून सैनिक का तय है निकलेगा
इस तरफ उस तरफ चले गोली
 
जो भी माँगा वही मिला तुझसे
कुछ तिलिस्मी थी माँ तेरी झोली 

सोमवार, 17 अगस्त 2020

एक बुग्नी फूल सूखा डायरी ...

धूप कहती है निकल के दें दें
रौशनी हर घर को चल के दें दें  

साहूकारों की निगाहें कह रहीं
दाम पूरे इस फसल के दें दें

तय अँधेरे में तुम्हें करना है अब
जुगनुओं का साथ जल के दें दें

बात वो सच की करेगा सोच लो
आइना उनको बदल के दें दें

फैंसला लहरों को अब करना है ये
साथ किश्ती का उछल के दे ... दें

सच है मंज़िल पर गलत है रास्ता
रास्ता रस्ता बदल के दे ... दें

एक बुग्नी, फूल सूखा, डायरी  
सब खज़ाने हैं ये कल के दे ... दें

सोमवार, 10 अगस्त 2020

हाथ खेतों की धान होते हैं

वो जो कड़वी ज़ुबान होते हैं, 
एक तन्हा मचान होते हैं.


चुप ही रहने में है समझदारी, 
कुछ किवाड़ों में कान होते हैं.

एक दो, तीन चार, बस भी करो, 
लोग चूने का पान होते हैं.

उम्र है लोन, सूद हैं सासें, 
अन्न-दाता, किसान होते हैं.

गोलियाँ, गालियाँ, खड़े तन कर,
फौज के ही जवान होते हैं. 
 
जो नहीं हैं रियाज़ के आदी,
एक टूटी सी तान होते हैं.
 
रख दिए साहूकार पे गिरवी,
हाथ खेतों की धान होते हैं.

सोमवार, 3 अगस्त 2020

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी


अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं दरवाज़ों में अपनी

तभी तो ज़िन्दगी जीते हैं सब टुकड़ों में अपनी

 

तू यूँ ही बोलना मैं भी फ़कत सुनता रहूँगा

सुनो शक्कर ज़रा कम डालना बातों में अपनी

 

अभी तो रात ने दिन का शटर खोला नहीं है

चलो इक नींद तो लेने दो तुम बाहों में अपनी

 

कभी गुस्सा, झिझकना, रूठना, फिर मान जाना

हमेशा बोलती रहती हो तस्वीरों में अपनी

 

कहीं कमज़ोर ना कर दें बुलंदी के इरादे

समुन्दर रोक के रखना ज़रा पलकों में अपनी

 

ज़रुरत जब हुई महसूस हमको ज़िन्दगी में

दुआएं दोस्तों की गई खातों में अपनी

 

कई अलफ़ाज़ जब मुंह मोड़ लेते हैं बहर से

तुम्हारा नाम लिख देता हूँ बस ग़ज़लों में अपनी

 

सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने

परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी

 

झुकी पलकें दुपट्टा आसमानी चाल अल्हड़

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी

सोमवार, 27 जुलाई 2020

वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया


आँसुओं से तर-ब-तर मासूम कन्धा रह गया
वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया

मिल गया जो उसकी माया, जो हुआ उसका करम
पा लिया तुझको तो सब अपना पराया रह गया

आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम 
झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया

छू के तुझको कुछ कहा तितली ने जिसके कान में 
इश्क़ में डूबा हुआ वाहिद वो पत्ता रह गया

आपको देखा अचानक बज उठी सीटी मेरी
उम्र तो बढ़ती रही पर दिल में बच्चा रह गया

कर भी देता मैं मुकम्मल शेर तेरे हुस्न पर
क्या कहूँ लट से उलझ कर एक मिसरा रह गया

मैं भी कुछ जल्दी में था, रुकने को तुम राज़ी न थीं
शाम का नीला समुन्दर यूँ ही तन्हा रह गया

बोलना, बातें, बहस, तकरार, झगड़ा, गुफ्तगू  
इश्क़ की इस दिल्लगी में अस्ल मुद्दा रह गया

कुछ कहा नज़रों ने, कुछ होठों ने, सच किसको कहूँ 
यूँ शराफत सादगी में पिस के बंदा रह गया

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं ...


उदासी से घिरी तन्हा छते हैं
कई किस्से यहाँ के घूरते हैं

परिंदों के परों पर घूमते हैं
हम अपने घर को अकसर ढूँढ़ते हैं

नहीं है इश्क पतझड़ तो यहाँ क्यों
सभी के दिल हमेशा टूटते हैं

मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं

नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं

कभी तो राख़ हो जाएँगी यादें
तुम्हे सिगरेट समझ कर फूंकते हैं

लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं

लगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं

सोमवार, 20 जुलाई 2020

हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे


ज़िन्दगी में हैं कई लोग आग हों जैसे
हर अँधेरे में सुलगते हैं जुगनुओं जैसे

सोच लेता हूँ कई बार बादलों जैसे
भीग लेने दूं किसी छत को बारिशों जैसे

बैठे बैठे भी कई बार चौंक जाता हूँ
दिल में रहते हैं कई लोग हादसों जैसे

हम सफ़र बन के मेरे साथ वो नहीं तो क्या
मील दर मील खड़े हैं वो पत्थरों जैसे   

दिल के गहरे में कई दर्द रोज़ उठते हैं
भूल जाता हूँ में हर बार मुश्किलों जैसे

लोग ऐसे भी मेरी ज़िन्दगी में आए हैं
खिलते रहते हैं हमेशा जो तितलियों जैसे

सरसरी सी ही नज़र डालना कभी हम पर
हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे

सोमवार, 13 जुलाई 2020

गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है ...


कहीं खामोश है कंगन, कहीं पाज़ेब टूटी है
सिसकता है कहीं तकिया, कहीं पे रात रूठी है

अटक के रह गई है नींद पलकों के मुहाने पर
सुबह की याद में बहकी हुई इक शाम डूबी है

यहाँ कुछ देर बैठो चाय की दो चुस्कियाँ ले लो
यहीं से प्रेम की ऐ. बी. सी. पहली बार सीखी है

न क्यों सब इश्क़ के बीमार मिल कर के बहा आएँ
इसी सिन्दूर ने तो आशिकों की जान लूटी है

उसे भी एड़ियों में इश्क़ का काँटा चुभा होगा
मेरी भी इश्क़ की पगडंडियों पे बाँह छूटी है

धुंवे में अक्स तेरा और भी गहरा नज़र आए   
किसी ने साथ सिगरेट के तुम्हारी याद फूँकी है

झमाँ झम बूँद बरसी, और बरसी, रात भर बरसी
मगर इस प्रेम की छत आज भी बरसों से सूखी है

बहाने से बुला लाया जुनूने इश्क़ भी तुमको
खबर सर टूटने की सच कहूँ बिलकुल ही झूठी है

किसी की बाजुओं में सो न जाए थक के ये फिर से
गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है

सोमवार, 6 जुलाई 2020

इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या ...

यूँ ही मुझको सता रही हो क्या 
तुम कहीं रूठ क चली हो क्या

उसकी यादें हैं पूछती अक्सर
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या

मुद्दतों से तलाश है जारी
ज़िन्दगी मुझसे अजनबी हो क्या

वक़्त ने पूछ ही लिया मुझसे
बूढ़े बापू की तुम छड़ी हो क्या

तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
माँ कहीं आस पास ही हो क्या

दर्द से पूछने लगी खुशियाँ
एक लम्हा था अब सदी हो क्या

मुझसे औलाद पूछती है अब
इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या
(तरही गज़ल)