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सोमवार, 21 जनवरी 2019

न्याय-व्यवस्था ...


कौन हूँ मैं
आँखों में पट्टी लपेटे
दूर तक गहरा देखने की क्षमता से विकसित
श्वेत धवल पाषाण काया में  
सत्य की तराजू थामे
झूठ के ग्रुत्वाकर्षण से मुक्त
स्थित्प्रग्य, संवेदना से परे 
गरिमामय वैभवशाली व्यक्तित्व लिए

याद आया कौन हूँ ... ?

सुना है कभी दुधारी तलवार हुवा करती थी
चलती थी इतना महीन कि पद-चाप सुनाई दे
सूर्य का तेज, तूफ़ान की गति
थम जाती थी मेरे सम्मोहन से सब की मति

क्या .... अभी भी नहीं समझे?

समझोगे कैसे ...
मैं कुंद, जंग लगी तलवार हूँ  
तार तार पट्टी से लाज बचाती   
अपने ही परिहास का बोझा उठाए
अंधी, बेबस, लाचार हूँ
बंद रहती हूँ अमीरो की रत्न-जड़ित तिजोरी में
क़ानून की लम्बी बहस में अटकी व्यवस्था की चार-दिवारी में
गरीबी की लाचारी में, महाजन की उधारी में
न्याय की ठेकेदारी में, वकीलों की पेशेदारी में  

शाहबानों के किस्सों में, निर्भया के हिस्सों मैं  
दंगों की आफत में, घोटालों की विरासत में

सुना है बूढ़ी होते आँखें के सपने, जवानी की आशा   
ताक रहे हैं मेरा तराज़ू  

कानून की धाराओं में जकड़ी 
चीख रही है आत्मा मेरी

क़ानून की किसी धारा में खोजो
न हो तो तलवार से भेदो
मेरे गौरव-शाली इतिहास को आधार दो

मुझ न्याय को न्याय से जीने का अधिकार दो

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

सिरा सुख दुःख का ...


दुःख नहीं होगा तो क्या जी सकेंगे ...

खिलती हुई धूप के दुबारा आने की उमंग
स्याह रात को दिन के लील लेने के बाद जागती है

सर्दी के इंतज़ार में देवदार के ठूंठ न सूखें
तो बर्फ की सफ़ेद चादर तले प्रेम के अंकुर नहीं फूटते

काले बादल के ढेर कड़कते हुए न गरजें
तो बेमानी सावन बरसते हुए भी भिगो नहीं पाता

मिलन के ठीक एक लम्हा पहले बिछड़ने की याद
बे-मौसम खिला देती हैं फूल
पंछी भी गाने लगते हैं गीत

सच बताना क्या सुख का एहसास दुःख से नहीं ...
सुख का एक सिरा दुःख का दूसरा सिरा नहीं ...?

सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

बुखार ... खुमारी ... या जंगली गुलाब ...


बेहोशी ने अभी लपेटा नहीं बाहों में
रुक जाती है रफ़्तार पत्थर से टकरा कर 
जाग उठता है कायनात का कारोबार
नींद गिर जाती है उस पल
नींद की आगोश से  

दो पल अभी गुज़रे नहीं
ख़त्म पहाड़ी का आखरी सिरा 
हवा में तैरता शरीर
चूक गयी हो जैसे ज़मीन की चुम्बक 
नींद का क्या
गिर जाती है फिर नींद की आगोश से 

रात का अंजान लम्हा
लीलते समुन्दर से
सिर बाहर रखने की जद्दो-जहद
हवा फेफड़ों में भर लेने की जंग
शोर में बदलती “क्या हुआ” “उठो” की हलकी धमक
लौटा तो लाती हो तुम पसीने से लथपथ बदन
पर नींद फिर गिर जाती है
नींद की आगोश से

वो क्या था
तपते “बुखार” में सुलगता बदन
गहरी थकान में डूबी खुमारी 
या किसी जंगली गुलाब के एहसास में गुज़री रात    

दिन के उजाले में जागता है मीठा दर्द
पर कहाँ ...
छोड़ो ... ये भी कोई सोचने की बात है ...

सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

हिसाब ... बे-हिसाब यादों का ...


सुबह हुई और भूल गए
यादें सपना नहीं

यादें कपड़ों पे लगी धूल भी नहीं
झाड़ो, झड़ गई

उम्र से बे-हिसाब
जिंदगी के दिन खर्च करना
समुंदर की गीली रेत से सिप्पिएं चुनना   
सब से नज़रें बचा कर
अधूरी इमारतों के साए में मिलना
धुंए के छल्लों में
उम्मीद भरे लम्हे ढूंढना
हाथों में हाथ डाले घंटों बैठे रहना  

जूड़े में टंके बासी फूल जैसे  
क्या फैंक सकोगी यादें

बे-हिसाब बीते दिन
जिंदगी के पेड़ पे लगे पत्ते नहीं 
पतझड़ आया झड़ गए ...

सोमवार, 6 अगस्त 2018

एहसास ... जिन्दा होने का ...


एहसास ... जी हाँ ... क्यों करें किसी दूसरे के एहसास की बातें, जब की खुद का होना भी बे-मानी हो जाता है कभी कभी ... अकसर ज़िन्दगी गुज़र जाती है खुद को चूंटी काटते काटते ... जिन्दा हूँ तो उसका एहसास क्यों नहीं ... 


उँगलियों में चुभे कांटे
इसलिए भी गढ़े रहने देता हूँ 
कि हो सके एहसास खुद के होने का

हालांकि करता हूँ रफू जिस्म पे लगे घाव
फिर भी दिन है 
कि रोज टपक जाता है ज़िंदगी से 

उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम    
कि बेहतर है सपने टूटने से
उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना उम्र भर  

सिवाए इसके की खुदा याद आता है
वजह तो कुछ भी नहीं तुम्हें प्रेम करने की 

और वजह जंगली गुलाब के खिलने की ...?
ये कहानी फिर कभी ...

सोमवार, 19 मार्च 2018

समय - एक इरेज़र ... ?


यादें यादें यादें ... क्यों आती हैं ... कब आती हैं ... कैसे आती हैं ... जरूरी है यादों की यादों में रहना ... या साँसों  का हिसाब रखना ... या फिर जंगली गुलाब का याद रखना ...

सांसों के सिवा
मुसलसल कुछ नहीं जिंदगी में
वैसे तिश्नगी भी मुसलसल होती है
जब तक तू नहीं होती

पतझड़ का आना बेसबब नहीं 
सूखे पत्तों के चटखने की आवाज़ से
कितनी मिलती जुलती है
तेरी हंसी की खनक  

यादें आएं इसलिए ज़रूरी है
किसी का चले जाना जिंदगी से
हालाँकि नहीं भरते समय की तुरपाई से
कुछ यादों के हल्के घाव भी

कोरे कैनवस में रंग भरने के लिए 
जैसे ज़रूरी है यादों का सहारा
उतना ही ज़रूरी है 
अपने आप से बातें करना

अज़ाब बन के आती हैं जंगली गुलाब की यादें 
समय वो इरेज़र नहीं जो मिटा सके ...

सोमवार, 5 मार्च 2018

क़र्ज़ मुहब्बत का ...


उम्र खर्च हो जाती है लम्हा लम्हा
तुम्हारी यादों का सिलसिला ख़त्म नहीं होता

कडाके की ठंड और बरसाती लम्हों के बीच
बूढ़ी होती दूकान से उठती अदरक वाली चाय की महक 
खाली कप पे ताज़ा लिपस्टिक के निशान
कुछ साए उठ के गए हैं यहाँ से अभी 
क़दमों के निशान कितने मिलते हैं तेरे मेरे क़दमों से

हवा के झोंके उड़ा ले जाते हैं पीले पत्ते
पी लेती है नुक्कड़ की तनहाई उनका दर्द  
जैसे तुम ढांक देती थीं मुहब्बत का आँचल  
वक़्त के साथ सिकुड़ते हुए उस कोने में मिलती हो रोज़ 
सूखे पत्तों से मुहब्बत का खेल खेलते

डूबते सूरज के साथ नहीं डूबती तुम्हारी रौशनी
चाँद के साथ हो लेती है
सूरज उठा लेता है तुम्हे चाँद के पहलू से सुबह
चलता रहता है कायनात का कारोबार
तेरी मुहब्बत की रौशनी भी खेलती है ऐसे खेल

नहीं थकते दीवार पे टंगे तुम्हारे कंधे
झेलते हैं रात भर सांसों का बोझ
कुछ यादें जैसे चुका रही हैं प्रेम की किश्तें
मुहब्बत का क़र्ज़ ख़त्म होने का नाम नहीं लेता  

मद्र स्वर में विलंबित गति का गीत है मुहब्बत
खामोश ताल पे अनवरत बजता हुआ  
किरदार हैं जो बदलते हैं समय के साथ

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

साक्षात्कार ब्रह्म से ...

ढूंढता हूँ बर्फ से ढंकी पहाड़ियों पर
उँगलियों से बनाए प्रेम के निशान
मुहब्बत का इज़हार करते तीन लफ्ज़
जिसके साक्षी थे मैं और तुम
और चुप से खड़े देवदार के कुछ ऊंचे ऊंचे वृक्ष    

हाँ ... तलाश है बोले हुए कुछ शब्दों की 
जिनको पकड़ने की कोशिश में
भागता हूँ सरगोशियों के इर्द-गिर्द
दौड़ता हूँ पहाड़ पहाड़, वादी वादी

सुना है लौट कर आती हैं आवाजें
ब्रह्म रहता है सदा के लिए कायनात में 
श्रृष्टि में बोला शब्द शब्द

हालांकि मुश्किल नहीं उस लम्हे में लौटना   
पर चाहत का कोई अंत नहीं 

उम्र की ढलान पे 
अतीत के पन्नों में लौटने से बेहतर है 
साक्षात ब्रह्म से साक्षात्कार करना  

शनिवार, 20 जनवरी 2018

कहानी प्रेम की ...

तुम्हारा प्यार
जैसे पहाड़ों पे उतरी कुनमुनी धूप
झांकती तो थी मेरे आँगन  
पर मैं समझ न सका
वो प्यार की आंख-मिचोली है
या सुलगते सूरज से पिधलती सर्दियों की धूप

सर्दियों के दिन भी कितनी जल्दी ढल जाते हैं  
अभी पहाड़ी से निकले नहीं
की उतर गए देवदार की लंबी कतारों के पीछे

मौसम की सरसराहट के साथ धूप की तपिश जिस्म गरमाने लगी
जंगली गुलाब की झाड़ी मासूम कलियों से खिलने लगी
कायनात प्यार की खुशबू से महकने लगी

फिर अचानक वक़्त की करवट 
और बढ़ने लगे पहरे, हवाओं के  

तेज आंधी ने आसमान को अंधेरे की चादर तले ढक दिया
कई दिनों धूप मेरे आँगन नहीं उतरी

धीरे धीरे वक्त गुज़रा ...

सर्दियों के दिन फिर लौट के आने लगे
गुलाबी धूप भी पहाड़ों पे इतराने लगी 

पर कोने में लगी उस जंगली गुलाब की कांटे-दार झाड़ी में 
अब फूल खिलने बंद हो गए थे

सोचता हूँ प्रेम मौसम के साथ क्यों नहीं चलता ...   

सोमवार, 15 जनवरी 2018

समय ...

तपती रेत के टीलों से उठती आग
समुन्दर का गहरा नीला पानी
सांप सी बलखाती “शेख जायद रोड़”
कंक्रीट का इठलाता जंगल

सभी तो रोज नज़र आते थे रुके हुवे  
मेरे इतने करीब की मुझे लगा  
शायद वक़्त ठहरा हुवा है मेरे साथ   

ओर याद है वो “रिस्ट-वाच” 
“बुर्ज खलीफा” की बुलंदी पे तुमने उपहार में दी थी
कलाई में बंधने के बाजजूद
कभी बैटरी नहीं डली थी उसमें मैंने  
वक्त की सूइयां
रोक के रखना चाहता था मैं उन दिनों 

गाड़ियों की तेज रफ़्तार
सुबह से दोपहर शाम फिर रात का सिलसिला
हवा के रथ पे सवार आसमान की ओर जाते पंछी
कभी अच्छा नहीं लगा ये सब मुझे ...
वक्त के गुजरने का एहसास जो कराते थे

जबकि मैं लम्हों को सदियों में बदलना चाहता था
वक़्त को रोक देना चाहता था
तुम्हारे ओर मेरे बीच एक-टक
स्तब्ध, ग्रुत्वकर्षण मुक्त 
टिक टिक से परे, धडकन से इतर
एक लम्हा बुनना चाहता था

लम्हों को बाँध के रखने की इस जद्दोजेहद में 
उम्र भी कतरा कतरा पिघल गई 

फिर तुम भी तो साथ छोड़ गयीं थी ... 

शेख जायद रोड - दुबई की एक मशहूर सड़क
बुर्ज खलीफा - अभी तक की दुनिया में सबसे ऊंची इमारत दुबई की