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सोमवार, 18 जनवरी 2021

ज़िन्दगी भी रेत सी फिसल गई ...

पीठ तेरी नज्र से जो जल गई.
ज़िन्दगी तब से ही हमको छल गई.
 
रौशनी आई सुबह ने कह दिया,
कुफ्र की जो रात थी वो ढल गई.
 
मुस्कुराए हम भी वो भी हंस दिए,
मोम की दीवार थी पिघल गई.
 
रात भर कश्ती संभाले थी लहर,
दिन में अपना रास्ता बदल गई.
 
इस तरफ कूआं तो खाई उस तरफ,
बच के किस्मत बीच से निकल गई.
 
जब तलक ये दाड़ अक्ल का उगा,
ज़िन्दगी भी रेत सी फिसल गई.

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

कभी वो आपकी, अपनी कभी सुनाते हैं

२०२० कई खट्टी-मीठी यादें ले के बीत गया ... जीवन जीने का नया अंदाज़ सिखा गया ... आप सब सावधान रहे, संयम बरतें ... २०२१ का स्वागत करें ... मेरी बहुत बहुत शुभकामनायें सभी को ...
 
हमारे प्यार की वो दास्ताँ बताते हैं
मेरी दराज़ के कुछ ख़त जो गुनगुनाते हैं 
 
चलो के मिल के करें हम भी अपने दिल रोशन
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं
 
किसी के आने की हलचल थीं इन हवाओं में
तभी पलाश के ये फूल खिलखिलाते हैं
 
झुकी झुकी सी निगाहें हैं पूछती मुझसे
ये किसके ख्वाब हैं जो रात भर जगाते हैं
 
कभी न प्यार में रिश्तों को आजमाना तुम
के आजमाने से रिश्ते भी टूट जाते हैं
 
अँधेरी रात के बादल को गौर से सुनना
कभी वो आपकी, अपनी कभी सुनाते हैं  

सोमवार, 23 नवंबर 2020

जगमग बुलंदियों पे ही ठहरे नहीं हैं हम ...

बहला रहे हो झूठ से पगले नहीं हैं हम.
बोलो न बात जोर से बहरे नहीं हैं हम.
 
हमसे जो खेलना हो संभल कर ही खेलना,
शतरंज पे फरेब के मोहरे नहीं हैं हम.
 
सोने सी लग रही हैं ये सरसों की बालियाँ,
तो क्या है जो किसान सुनहरे नहीं हैं हम.
 
हरबार बे-वजह न घसीटो यहाँ वहाँ,   
मसरूफियत है, इश्क़ में फुकरे नहीं हैं हम.  
 
मुश्किल हमारे दिल से उभरना है डूब के, 
हैं पर समुंदरों से तो गहरे नहीं हैं हम.
 
गुमनाम बस्तियों में गुजारी है ज़िन्दगी,
जगमग बुलंदियों पे ही ठहरे नहीं हैं हम.

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

जो कायरों से मरोगे तो कुछ नहीं होगा ...

गुलाम बन के रहोगे तो कुछ नहीं होगा
निज़ाम से जो डरोगे तो कुछ नहीं होगा
 
तमाम शहर के जुगनू हैं कैद में उनकी  
चराग़ छीन भी लोगे तो कुछ नहीं होगा
 
समूचा तंत्र है बहरा, सभी हैं जन गूंगे
जो आफताब भी होगे तो कुछ नहीं होगा
 
बदल सको तो बदल दो जहाँ की तुम किस्मत
जो भीड़ बन के चलोगे तो कुछ नहीं होगा 
 
कलम के साथ ज़रूरी है सबकी सहभागी
नहीं जो मिल के लड़ोगे तो कुछ नहीं होगा
 
जो मौत आ ही गयी मरना मार कर दुश्मन
जो कायरों से मरोगे तो कुछ नहीं होगा

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

मान लेते हैं हमारी हार है ...

आस्तीनों में छुपी तलवार है
और कहता है के मेरा यार है
 
गर्मियों की छुट्टियाँ भी खूब हैं
रोज़ बच्चों के लिए इतवार है
 
सच परोसा चासनी के झूठ में
छप गया तो कह रहा अख़बार है
 
चैन से जीना कहाँ आसान जब
चैन से मरना यहाँ दुश्वार है
 
दर्द में तो देख के राज़ी नहीं
यूँ जताते हैं की मुझ से प्यार है
 
खुद से लड़ने का हुनर आता नहीं  
मान लेते हैं हमारी हार है
 

सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

मुझे तू ढूंढ कर मुझसे मिला दे ...

मुझे इक आईना ऐसा दिखा दे.
हकीकत जो मेरी मुझको बता दे.
 
नदी हूँ हद में रहना सीख लूंगी,
जुदा सागर से तू मुझको करा दे.
 
में गीली रेत का कच्चा घरोंदा,
कहो लहरों से अब मुझको मिटा दे.
 
बढ़ा के हाथ कोशिश कर रहा हूँ,
ज़रा सा आसमाँ नीचे झुका दे.
 
में तारा हूँ चमक बाकी रहेगी,
अंधेरों में मेरा तू घर बना दे.
 
महक फूलों की रोके ना रुकेगी,
भले ही लाख फिर पहरे बिठा दे.
 
में खुद से मिल नहीं पाया हूँ अब तक,
मुझे तू ढूंढ कर मुझसे मिला दे.

सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

यूँ ही नज़रें गड़ाए रखिएगा

 ज़ख्म अपने छुपाए रखिएगा
महफ़िलों को सजाए रखिएगा
 
दुश्मनी है ये मानता हूँ पर   
सिलसिला तो बनाए रखिएगा
 
कुछ मुसाफिर ज़रूर लौटेंगे
एक दीपक जलाए रखिएगा
 
कल की पीड़ी यहाँ से गुजरेगी
आसमाँ तो उठाए रखिएगा
 
रूठ जाएँ ये उनकी है मर्ज़ी
आप पलकें बिछाए रखिएगा
 
काम जाएँ कब ये क्या जानें
आंसुओं को बचाए रखिएगा
 
शक्ल उनकी दिखेगी बादल में
यूँ ही नज़रें गड़ाए रखिएगा

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

उन बुज़ुर्गों को कभी दिल से ख़फा मत करना

ग़र निभाने की चले बात मना मत करना.
दिल के रिश्तों में कभी जोड़-घटा मत करना.
 
रात आएगी तो इनका ही सहारा होगा,
भूल से दिन में चराग़ों से दगा मत करना. 
 
माना वादी में अभी धूप की सरगोशी है,
तुम रज़ाई को मगर ख़ुद से जुदा मत करना.
 
कुछ गुनाहों का हमें हक़ मिला है कुदरत से,
बात अगर जान भी जाओ तो गिला मत करना.
 
दिल की बातों में कई राज़ छुपे होते हैं,
सुन के बातों को निगाहों से कहा मत करना.
 
है ये मुमकिन के सभी ख्वाब कभी हों पूरे ,
अपने सपनों को कभी खुद से फ़ना मत करना.
 
ज़िन्दगी अपनी लगा देते हैं जो शिद्दत से,
उन बुज़ुर्गों को कभी दिल से ख़फा मत करना. 

सोमवार, 31 अगस्त 2020

तेरा जाना ट्रिगर है यादों का बंधन

सिक्कों का कुछ चाँद सितारों का बंधन.
चुम्बक है पर तेरी बाहों का बंधन.
 
दिन में भी तो चाँद नज़र आ जाता है,
इसने कब माना है रातों का बंधन.
 
तेरी आहट जैसे ही दरवाज़े पर,
खोल दिया बादल ने बूंदों का बंधन.
 
जो करना है अभी करो, बस अभी करो,
किसने जाना कब तक साँसों का बंधन.
 
तुमसे रौनक, तुमसे रोटी, सब्जी, दाल,
वरना ये घर चार दीवारों का बंधन.
 
सूरज की दस्तक को कब तक ठुकराते,
टूट गया सपनों की बातों का बंधन.

कब तक तेरा साथ, वक़्त का पता नहीं,
तेरा जाना ट्रिगर है यादों का बंधन.

सोमवार, 3 अगस्त 2020

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी


अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं दरवाज़ों में अपनी

तभी तो ज़िन्दगी जीते हैं सब टुकड़ों में अपनी

 

तू यूँ ही बोलना मैं भी फ़कत सुनता रहूँगा

सुनो शक्कर ज़रा कम डालना बातों में अपनी

 

अभी तो रात ने दिन का शटर खोला नहीं है

चलो इक नींद तो लेने दो तुम बाहों में अपनी

 

कभी गुस्सा, झिझकना, रूठना, फिर मान जाना

हमेशा बोलती रहती हो तस्वीरों में अपनी

 

कहीं कमज़ोर ना कर दें बुलंदी के इरादे

समुन्दर रोक के रखना ज़रा पलकों में अपनी

 

ज़रुरत जब हुई महसूस हमको ज़िन्दगी में

दुआएं दोस्तों की गई खातों में अपनी

 

कई अलफ़ाज़ जब मुंह मोड़ लेते हैं बहर से

तुम्हारा नाम लिख देता हूँ बस ग़ज़लों में अपनी

 

सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने

परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी

 

झुकी पलकें दुपट्टा आसमानी चाल अल्हड़

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं ...


उदासी से घिरी तन्हा छते हैं
कई किस्से यहाँ के घूरते हैं

परिंदों के परों पर घूमते हैं
हम अपने घर को अकसर ढूँढ़ते हैं

नहीं है इश्क पतझड़ तो यहाँ क्यों
सभी के दिल हमेशा टूटते हैं

मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं

नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं

कभी तो राख़ हो जाएँगी यादें
तुम्हे सिगरेट समझ कर फूंकते हैं

लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं

लगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं

सोमवार, 20 जुलाई 2020

हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे


ज़िन्दगी में हैं कई लोग आग हों जैसे
हर अँधेरे में सुलगते हैं जुगनुओं जैसे

सोच लेता हूँ कई बार बादलों जैसे
भीग लेने दूं किसी छत को बारिशों जैसे

बैठे बैठे भी कई बार चौंक जाता हूँ
दिल में रहते हैं कई लोग हादसों जैसे

हम सफ़र बन के मेरे साथ वो नहीं तो क्या
मील दर मील खड़े हैं वो पत्थरों जैसे   

दिल के गहरे में कई दर्द रोज़ उठते हैं
भूल जाता हूँ में हर बार मुश्किलों जैसे

लोग ऐसे भी मेरी ज़िन्दगी में आए हैं
खिलते रहते हैं हमेशा जो तितलियों जैसे

सरसरी सी ही नज़र डालना कभी हम पर
हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे

सोमवार, 13 जुलाई 2020

गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है ...


कहीं खामोश है कंगन, कहीं पाज़ेब टूटी है
सिसकता है कहीं तकिया, कहीं पे रात रूठी है

अटक के रह गई है नींद पलकों के मुहाने पर
सुबह की याद में बहकी हुई इक शाम डूबी है

यहाँ कुछ देर बैठो चाय की दो चुस्कियाँ ले लो
यहीं से प्रेम की ऐ. बी. सी. पहली बार सीखी है

न क्यों सब इश्क़ के बीमार मिल कर के बहा आएँ
इसी सिन्दूर ने तो आशिकों की जान लूटी है

उसे भी एड़ियों में इश्क़ का काँटा चुभा होगा
मेरी भी इश्क़ की पगडंडियों पे बाँह छूटी है

धुंवे में अक्स तेरा और भी गहरा नज़र आए   
किसी ने साथ सिगरेट के तुम्हारी याद फूँकी है

झमाँ झम बूँद बरसी, और बरसी, रात भर बरसी
मगर इस प्रेम की छत आज भी बरसों से सूखी है

बहाने से बुला लाया जुनूने इश्क़ भी तुमको
खबर सर टूटने की सच कहूँ बिलकुल ही झूठी है

किसी की बाजुओं में सो न जाए थक के ये फिर से
गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है

सोमवार, 6 जुलाई 2020

इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या ...

यूँ ही मुझको सता रही हो क्या 
तुम कहीं रूठ क चली हो क्या

उसकी यादें हैं पूछती अक्सर
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या

मुद्दतों से तलाश है जारी
ज़िन्दगी मुझसे अजनबी हो क्या

वक़्त ने पूछ ही लिया मुझसे
बूढ़े बापू की तुम छड़ी हो क्या

तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
माँ कहीं आस पास ही हो क्या

दर्द से पूछने लगी खुशियाँ
एक लम्हा था अब सदी हो क्या

मुझसे औलाद पूछती है अब
इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या
(तरही गज़ल)