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सोमवार, 5 मार्च 2018

क़र्ज़ मुहब्बत का ...


उम्र खर्च हो जाती है लम्हा लम्हा
तुम्हारी यादों का सिलसिला ख़त्म नहीं होता

कडाके की ठंड और बरसाती लम्हों के बीच
बूढ़ी होती दूकान से उठती अदरक वाली चाय की महक 
खाली कप पे ताज़ा लिपस्टिक के निशान
कुछ साए उठ के गए हैं यहाँ से अभी 
क़दमों के निशान कितने मिलते हैं तेरे मेरे क़दमों से

हवा के झोंके उड़ा ले जाते हैं पीले पत्ते
पी लेती है नुक्कड़ की तनहाई उनका दर्द  
जैसे तुम ढांक देती थीं मुहब्बत का आँचल  
वक़्त के साथ सिकुड़ते हुए उस कोने में मिलती हो रोज़ 
सूखे पत्तों से मुहब्बत का खेल खेलते

डूबते सूरज के साथ नहीं डूबती तुम्हारी रौशनी
चाँद के साथ हो लेती है
सूरज उठा लेता है तुम्हे चाँद के पहलू से सुबह
चलता रहता है कायनात का कारोबार
तेरी मुहब्बत की रौशनी भी खेलती है ऐसे खेल

नहीं थकते दीवार पे टंगे तुम्हारे कंधे
झेलते हैं रात भर सांसों का बोझ
कुछ यादें जैसे चुका रही हैं प्रेम की किश्तें
मुहब्बत का क़र्ज़ ख़त्म होने का नाम नहीं लेता  

मद्र स्वर में विलंबित गति का गीत है मुहब्बत
खामोश ताल पे अनवरत बजता हुआ  
किरदार हैं जो बदलते हैं समय के साथ