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सोमवार, 17 सितंबर 2018

कभी तो ...

कभी तो गूंजो कान में
गुज़र जाओ छू के कंधा
गुज़र जाती है क़रीब से जैसे आवारा हवा

उतर आओ हथेली की रेखाओं में
जैसे सर्दी की कुनमुनाती धूप
खिल उठो जैसे खिलता है जंगली गुलाब
पथरीली जमीन पर

झांको छुप छुप के झाड़ी के पीछे से
झाँकता है जैसे चाँद बादल की ओट से

मिल जाओ अचानक नज़रें चुराते
मिलते हैं जाने पहचाने दो अजनबी जैसे

मैं चाहता हूँ तुम्हें ढूँढ निकालना
अतीत के गलियारे से
वर्तमान की राह पर ... 

सोमवार, 6 अगस्त 2018

एहसास ... जिन्दा होने का ...


एहसास ... जी हाँ ... क्यों करें किसी दूसरे के एहसास की बातें, जब की खुद का होना भी बे-मानी हो जाता है कभी कभी ... अकसर ज़िन्दगी गुज़र जाती है खुद को चूंटी काटते काटते ... जिन्दा हूँ तो उसका एहसास क्यों नहीं ... 


उँगलियों में चुभे कांटे
इसलिए भी गढ़े रहने देता हूँ 
कि हो सके एहसास खुद के होने का

हालांकि करता हूँ रफू जिस्म पे लगे घाव
फिर भी दिन है 
कि रोज टपक जाता है ज़िंदगी से 

उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम    
कि बेहतर है सपने टूटने से
उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना उम्र भर  

सिवाए इसके की खुदा याद आता है
वजह तो कुछ भी नहीं तुम्हें प्रेम करने की 

और वजह जंगली गुलाब के खिलने की ...?
ये कहानी फिर कभी ...

सोमवार, 28 मई 2018

बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं ...


होठ दांतों में दबाना तो नहीं
यूँ ही कुछ कहना सुनाना तो नहीं

आप जो मसरूफ दिखते हो मुझे
गम छुपाने का बहाना तो नहीं

एक टक देखा हँसे फिर चल दिए
सच कहो, ये दिल लगाना तो नहीं

पास आना फिर सिमिट जाना तेरा
प्रेम ही है ना, सताना तो नहीं

कप से मेरे चाय जो पीती हो तुम
कुछ इशारों में बताना तो नहीं

सच में क्या इग्नोर करती हो मुझे
ख्वामखा ईगो दिखाना तो नहीं

इक तरफ झुकना झटकना बाल को
उफ्फ, अदा ये कातिलाना तो नहीं

रात भर "चैटिंग" सुबह की ब्लैंक काल
प्रेम ही था "मैथ" पढ़ाना तो नहीं

कुछ तो था अकसर करा करतीं थीं तुम 
बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं


सोमवार, 19 मार्च 2018

समय - एक इरेज़र ... ?


यादें यादें यादें ... क्यों आती हैं ... कब आती हैं ... कैसे आती हैं ... जरूरी है यादों की यादों में रहना ... या साँसों  का हिसाब रखना ... या फिर जंगली गुलाब का याद रखना ...

सांसों के सिवा
मुसलसल कुछ नहीं जिंदगी में
वैसे तिश्नगी भी मुसलसल होती है
जब तक तू नहीं होती

पतझड़ का आना बेसबब नहीं 
सूखे पत्तों के चटखने की आवाज़ से
कितनी मिलती जुलती है
तेरी हंसी की खनक  

यादें आएं इसलिए ज़रूरी है
किसी का चले जाना जिंदगी से
हालाँकि नहीं भरते समय की तुरपाई से
कुछ यादों के हल्के घाव भी

कोरे कैनवस में रंग भरने के लिए 
जैसे ज़रूरी है यादों का सहारा
उतना ही ज़रूरी है 
अपने आप से बातें करना

अज़ाब बन के आती हैं जंगली गुलाब की यादें 
समय वो इरेज़र नहीं जो मिटा सके ...