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सोमवार, 26 मार्च 2018

जीत या हार ...


सपने पालने की कोई उम्र नहीं होती

वो अक्सर उतावली हो के बिखर जाना चाहती थी
ऊंचाई से गिरते झरने की बूँद सरीखी
ओर जब बाँध लिया आवारा मोहब्बत ने उसे ... 
उतर गई अंधेरे की सीडियां, आँखें बंद किए

ये सच है वो होता है बस एक पल 
बिखर जाने के बाद समेटने का मन नहीं होता जिसे

उम्र की सलेट पर जब सरकती है ज़िंदगी
कायनात खुद-ब-खुद बन जाती है चित्रकार
हालांकि ऐसा दौर कुछ समय के लिए आता है सबके जीवन में

(ओर वो भी तो इसी दौर से गुज़र रही थी
मासूम सा सपना पाले)

फिर आया तनहाई का लम्बा सफ़र

उजली बाहों के कई शहसवार वहां से गुज़रे
पर नहीं खुला सन्नाटों का पर्दा ...
उम्र काफी नहीं होती पहली मुहब्बत भुलाने को   
जुम्बिश खत्म हो जाती है आँखों की   
पर यादें ...
वो तो ताज़ा रहती हैं जंगली गुलाब की खुशबू लिए 

ये जीत है आवारा मुहब्बत की या हार उस सपने की
जिसको पालने की कोई उम्र नहीं होती

सोमवार, 12 मार्च 2018

सफ़र जो आसान नहीं ...


बेतहाशा फिसलन की राह पर
काम नहीं आता मुट्ठियों से घास पकड़ना  
सुकून देता है उम्मीद के पत्थर से टकराना
या रौशनी का लिबास ओढ़े अंजान टहनी का सहारा 
थाम लेती है जो वक़्त के हाथ 

चुभने के कितने समय बाद तक
वक़्त का महीन तिनका 
घूमता रहता है दर्द का तूफानी दरिया बन कर
पाँव में चुभा छोटा सा लम्हा
शरीर छलनी होने पे ही निकल पाता है

अभी सुख की खुमारी उतरी भी नहीं होती 
आ जाती है दुःख की नई लहर
आखरी पाएदान पे जो खड़ी होती है सुख के  

हर आग की जलन एक सी 
किसी ठहरे हुवे सवाल की तरह
लम्हों की राख रह जाती है जगह जगह इतिहास समेटे
हाथ लगते ही ख्वाब टूट जाता है
सवाल खड़ा रहता है

उम्मीद का उजाला
आँखों का काजल बन के नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद
किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को

किसी साए के सहारे भी तो जिंदगी नहीं चलती

बुधवार, 3 जनवरी 2018

उम्र के छलावे ...

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक मंगल कामनाएं ... २०१८ सबके लिए शुभ हो. नव वर्ष की शुरुआत एक रचना के साथ ... जाने क्यों अभी तक ब्लॉग पे नहीं डाली ... अगर आपके दिल को भी छू सके तो लिखना सार्थक होगा ...

तेरे चले जाने के बाद
पतझड़ की तरह कुछ पत्ते डाल से झड़ने लगे थे  
गमले में लगी तुलसी भी सूखने लगी थी
हालांकि वो आत्महत्या नहीं थी

वो तेरे स्पर्श का आभाव भी नही था   
क्योंकि समय के साथ कोने में पड़े कैक्टस पे फूल आने लगे थे
दावा तो नहीं कर सकता की वो खुशी के नहीं थे  

छत पे उतरी सीलन
जैसे कोरे कैनवस पे अजीबो-गरीब रेखाओं में बना तेरा अक्स  
जानता हूँ अगली बारिश से पहले छत की मरम्मत ज़रूरी है

ड्रैसिंग टेबल से सारी चीजें फिकवाने के बावजूद
नए रूम फ्रेशनर का कोई असर नहीं हो रहा
तेरे ब्रैंड के डीयो की खुशबू झड़ती है दिवारों से 
लगता है अगले साल घर की सफेदी भी करवानी होगी

पिछले कई दिनों से
बीते लम्हों की काई जमने लगी है फर्श पर 
टूटी टाइलों की झिर्रियों से यादों की बास उठने लगी है
लगता है अगली गर्मियों से पहले ये मार्बल भी बदलना होगा  

और इस खिड़की, रोशनदान का क्या करूं
पल्लों की ओट से लुका छिपी का खेल खेलते अब साँस फूलने लगी है 
तेरे होने का एहसास बार बार खिड़की के मुहाने ले आता है 
लगता है अगले साल तक इन्हें भी बंद करवाना होगा

और कोने में पड़ा आदम कद टैडी-बियर
वो भी पिछले कई दिनों से उदास है
तेरे चले जाने के बाद मैं उससे लिपट के सोने लगा था
अजीब सी जिस्मानी गंध रहती है उसमें
गहरे लाल लिपस्टिक के निशानों से अटा वो टैडी-बियर  
सोचता हूँ अबकी सर्दियों से पहले गरम कपड़ों के साथ
इसको भी ड्राई-क्लीन करवा लूँ

सच कहूं तो इतना कुछ है करने के लिए
समझ नहीं आता कहाँ से शुरुआत करूं ...
हाथ की लकीरों में उम्र की लकीर देख के हंसी आने लगी है अब
अपने आप से बातें करना सकून देने लगा है 

पता नहीं ये खुद से किये वादे हैं या जिंदगी के छलावे ...