मंगलवार, 6 जनवरी 2009

बन सकें जो लक्ष्य प्रेरित बाण हम

बन सकें जो लक्ष्य प्रेरित बाण हम
कर सकें जग का कभी जो त्राण हम
सार्थक हो जाएगा जीवन हमारा
कर सकें युग का पुनः निर्माण हम

कौन जाने समय में है क्या लिखा
क्या पता ख़ुद कृष्ण हों मेरे सखा
स्वयं का तर्पण करो कुरुक्षेत्र में
यूँ जलो ज्यों दीप की अग्नी शिखा

हृदय में अग्नी सदा जलती रहे
चिर-विजय की कामना पलती रहे
तेरे उपवन में खिले हों पुष्प सारे
स्नेह की सरिता प्रबल बहती रहे

वंदना है माँ तुम्हारे चरण में
है समर्पित शीश तेरे हवन में
पार्थ में बन जाऊँ यह वरदान दो
धनुष की टंकार गूंजे गगन में

शत्रु को हम ठीक से फ़िर जान लें
स्वयं के अस्तित्व को भी मान लें
फ़िर अतीत को नही विस्म्रण करें
संगठन की शक्ति को पहचान लें

रविवार, 4 जनवरी 2009

ज़िन्दगी बनवास है

हवस है कैसी, नही बुझती तुम्हारी प्यास है
अपने हिस्से का समुन्दर, तो तुम्हारे पास है

साँस लेती हैं दीवारें, आंख हैं ये खिड़कियाँ
इस शहर के खंडहरों से, बोलता इतिहास है

लाल है पत्ते यहाँ सब, लाल उगती घास है
सोई हुयी है दास्ताँ, बिखरा हुवा विशवास है

मेरे घर के पास से, गुजरा था तेरा काफिला
घर मेरा उस रोज़ से, खिलता हुवा मधुमास है

मुद्दतों से लौट कर, क्यूँ घर न आए तुम मेरे
यूँ तो रहता हूँ मैं घर, पर ज़िन्दगी बनवास है

तुझसे पहले आ गयी थी, तेरे आने की ख़बर
खिल उठी खेतों मैं सरसों, छा गया उल्लास है

बुधवार, 31 दिसंबर 2008

घर मेरा मेरी जियारत

२००९ की ढेरों शुभ-कामनाएं

नव वर्ष मंगलमय हो, सबके दुखों का क्षय हो
प्रभू चरण में वंदन है, सबका जीवन सुखमय हो

इस साल की अन्तिम रचना है यह, आप सब का आभार है जो मुझे प्रोत्साहित करते रहते हैं.


प्यार से कैसी शिकायत
प्यार तो रब की अमानत

हम भी तेरे दिल में रहते
वक़्त की होती इनायत

चूमते क़दमों को तेरे
आप की होती इजाज़त

ताज है जिनके सरों पर
लोग करते हैं इबादत

धूप या सर्दी का मौसम
बेघरों पर है क़यामत

काट कर पीपल घरों का
धूप से क्यों है शिकायत

देश की सीमायें अक्सर
खून से लिक्खी इबारत

जंग का ऐलान है यह
आग से जलती इमारत

मार खाते, लौट आते
है यही कुत्तों की आदत

बारिशों ने फूल धोये
खुशबुओं ने की बगावत

हाथ में जिनके छुरा था
मिल गयी उनको ज़मानत

आस्था या सत्य है यह
आब-ऐ-गंगा में नज़ाफत

लौट कर कब जाउंगा मैं
घर मेरा मेरी जियारत

(नज़ाफत - शुद्धता, स्वछता, जियारत-तीर्थ यात्रा, धर्म स्थल पर जाना)

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

अधूरी दास्ताँ

टूट कर बिखरे हुवे पत्थर समय से मांगते
कुछ अधूरी दास्ताँ खंडहर समय से मांगते

क्यों हुयी अग्नी परीक्षा, दाव पर क्यों द्रोपदी
आज भी कुछ प्रश्न हैं उत्तर समय से मांगते

हड़ताल पर बैठे हुवे तारों का हठ तो देखिये
चाँद जैसी प्रतिष्ठा आदर समय से मांगते

चाँदनी से जल गए थे जिनके दरवाजे कभी
रौशनी सूरज की वो अक्सर समय से मांगते

फूल जो काँटों का दर्द सह नही पाते यहाँ
समय से पहले वही पतझड़ समय से मांगते

रविवार, 21 दिसंबर 2008

घंटियों में गूंजती अज़ान होना चाहिए

गीत जो गाना हो राष्ट्रगान होना चाहिए
घंटियों में गूंजती अज़ान होना चाहिए

बाइबल गीता यहाँ, कुरान होना चाहिए
जो कोई इनको पढ़े इंसान होना चाहिए

आज भी है इंतज़ार में तुम्हारे अहिल्या
राम को जाते हुवे यह भान होना चाहिए

गीदड़ों ने ओढ़ ली है खाल आज शेर की
आज से जंगल में जंगल राज होना चाहिए

आज फ़िर उठने लगा है दंभ शिशुपाल का
तर्जनी मैं चक्र का संधान होना चाहिए

टूट गयी व्यवस्था, न्याय है बिखरा हुवा
नया फ़िर से कोई संविधान होना चाहिए

होंसले को तुम जो मेरे चाहते हो तोलना
साथ कश्ती के मेरे तूफ़ान होना चाहिए

सागर जमीं आकाश चाँद सब तुम्हारे नाम है
दो गज हि सही मेरा भी मकान होना चाहिए

गाँव के बरगद तले डेरा है काले मेघ का
सूख गयी जो ज़मी, खलिहान होना चाहिए

छोड़ दो मुझको या दे दो कैद सारे उम्र की
मेरी ग़ज़ल इकबालिया बयान होना चाहिए

ढूंढते हो काहे मुझको अर्श की गहराई मैं
मील का पत्थर मेरा निशान होना चाहिए

पंछियों के घोंसलों से एक ही आवाज़ है
बेखोफ उड़ सकें वो आसमान होना चाहिए

अमावस के शहर में जुगनू है मेरी जेब में
उनके महल के सामने मकान होना चाहिए

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

एहसास

अक्सर ऐसा हुवा है
बहूत कोशिशों के बाद
जब उसे मैं छू न सका
सो गया मूँद कर आँखें अपनी
बहुत देर तक फ़िर सोया रहा
महसूस करता रहा उसके हाथ की नरमी
छू लिया हल्हे से उसके रुखसार को
उड़ता रहा खुले आसमान में
थामे रहा उसका हाथ
चुपके से सहलाता रहा उसके बाल
पर हर बार
जब भी मेरी आँख खुली
अचानक सब कुछ दूर
बहुत दूर हो गया
क्या वो सिर्फ़ इक एहसास था...................
एहसाह जिसे महसूस तो किया जा सकता है
पर जागती आखों से छुआ नही जा सकता
जागती आंखों से छुआ नही जाता

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

रिश्ते

काश ये रिश्ते
पतझड़ के पत्तों की तरह होते
मौसम के साथ बदल जाते....

काश ये रिश्ते
बादल की तरह होते
बरसते बिखर जाते....

काश ये रिश्ते
बहती हवा होते
छूते गुज़र जाते....

दिल के किसी कोने मैं
गहरा घाव तो न बनाते
आंसूं बन कर
पिघलते तो न रहते....

कितना अच्छा होता,
ये रिश्ते ही न होते................

रविवार, 14 दिसंबर 2008

ग़ज़ल

हाथ में जुम्बिश नज़र में ताब जब तक
कलम से लिक्खुंगा इन्कलाब तब तक

रौशनी का अपनी इंतज़ाम रक्खो
अर्श मैं जलता है आफताब कब तक

गुज़र गए दो, अभी बाकी हैं दो दिन
वक्त के सहता रहूँ अज़ाब कब तक

जब तलक साँसें है, दिल है और तुम हो
देख लूँगा ज़िन्दगी के ख्वाब तब तक

तोड़ कर यादों का कफ़स जान लोगे
जब तलक यादें हैं इज़्तिराब तब तक

चाहता हूँ फ़िर नयी शैतानियाँ करना
माँ तुझे आ जाए न इताब जब तक

उजड़ी हुयी इमारतों के ईंट पत्थर
मांगते हैं जुल्म का हिसाब अब तक

नज़रें झुकाए, हाथ जोड़े,मुस्कुरा कर
शैतान अब मिलेंगे इन्तिखाब जब तक

चंद लम्हे ही सही जी लो तमाम जिंदगी
ख्वाहिश औ अरमान की किताब कब तक

जब तलक जागे हैं पासबान-ऐ-चमन
हर कली, खिलता हुवा गुलाब तब तक

(अज़ाब-दर्द, इज़्तिराब-चिंता बैचेनी, इताब-क्रोध गुस्सा, इन्तिखाब-चुनाव)

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

व्यथा

मेरे घर के सामने से, तुम जो गुज़रो मुसाफिर,
ठहर जाना पल दो पल पीपल की ठंडी छाँव में....

हो भला सूखे हुवे पत्तों की आवाज़ें वहाँ,
टकटकी बांधे हुवे बूढा खड़ा होगा जहाँ,
रात में घर लौट कर पंछी न कोई आएगा,
सुबह से ही गीत कोई विरह के फ़िर गायेगा,

कुछ उदास चूड़ियाँ खनकेंगी तुम को देख कर,
खिड़कियों से झांकती आँखें मिलेंगी गाँव में,
ठहर जाना पल दो पल पीपल की ठंडी छाँव में....

लौट कर आती हुई लहरों से तुम फ़िर पूछना,
साहिलों की रेत में उनका निशां तुम ढूंढ़ना,
पूछना उस हवा से आयी है जो छु कर उन्हे,
क्या कभी भी याद आता है पुराना घर उन्हे,

तोड़ न देना वो दिल, पूछे जो तुमसे चीख कर,
कहाँ हैं वो मुसाफिर बैठे थे कल जो नाव में,
ठहर जाना पल दो पल पीपल की ठंडी छाँव में....

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

ग़ज़ल

आज फ़िर मंथन हुवा है, ज़हर है छिटका हुवा
आज शिव ने कंठ मैं फ़िर गरल है गटका हुवा

देखने हैं और कितने महा-समर आज भी
है त्रिशंकू आज भी इस भंवर में भटका हुवा

पोंछना है दर्द तो दिल के करीब जाओ तुम
दूर से क्यूँ देखते हो दिल मेरा चटका हुवा

राह सूनी, आँख रीति, जोड़ कर तिनके सभी
मुद्दतों से शाख पर है घोंसला लटका हुवा

इक समय था जब समय मुट्ठी मैं मेरी कैद था
अब समय है, मैं समय के चक्र में अटका हुवा