सोमवार, 29 जून 2020

चन्द यादों के कुछ करेले हैं ...


गम के किस्से, ख़ुशी के ठेले हैं
ज़िन्दगी में बहुत झमेले हैं

वक़्त का भी अजीब आलम है
कल थी तन्हाई आज मेले हैं

बस इसी बात से तसल्ली है
चाँद सूरज सभी अकेले हैं

भूल जाते हैं सब बड़े हो कर
किसके हाथों में रोज़ खेले हैं

चुप से बैठे हैं आस्तीनों में
नाग हैं या के उसके चेले हैं

टूट जाते हैं गम की आँधी से
लोग मिट्टी के कच्चे ढेले हैं

कितने मीठे हैं आज ये जाना
चन्द यादों के कुछ करेले हैं

खोल के ज़ख्म सब दिखा देंगे
मत कहो तुमने दर्द झेले हैं

सोमवार, 22 जून 2020

ईगो ...


दो पीठ के बीच का फांसला
मुड़ने के बाद ही पता चल पाता है

हालांकि इन्च भर दूरी
उम्र जितनी नहीं
पर सदियाँ गुज़र जाती हैं तय करने में

"ईगो" और "स्पोंड़ेलाइटिस"
कभी कभी एक से लगते हैं दोनों
फर्क महसूर नहीं होता

दर्द होता है मुड़ने पे
पर मुश्किल भी नहीं होती

जरूरी है बस एक ईमानदार कोशिश
दोनों तरफ से
एक ही समय, एक ही ज़मीन पर

हाँ ... एक और बात
ज़रूरी है मुड़ने की इच्छा का होना 

सोमवार, 15 जून 2020

यूँ ही गुज़रा - एक ख्याल ...


शबनम से लिपटी घास पर
नज़र आते हैं कुछ क़दमों के निशान

सरसरा कर गुज़र जाता है झोंका
जैसे गुजरी हो तुम छू कर मुझे

हर फूल देता है खुशबू जंगली गुलाब की  

खुरदरी हथेलियों की चिपचिपाहट
महसूस कराती है तेरी हाथों की तपिश  

उड़ते हुए धुल के अंधड़ में
दिखता मिटता है तेरा अक्स अकसर

जानता हूँ तुम नहीं हो आस-पास कहीं
पर कैसे कह दूँ की तुम दूर हो ...

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 8 जून 2020

सच के झूठ ... क्या सच ...


सच
जबकि होता है सच
लग जाती है
मुद्दत
सच की ज़मीन पाने में

झूठ
जबकि नहीं होता सच
फ़ैल जाता है
आसानी से
सच हो जैसे

हालांकि अंत
जबकि रह जाता है
केवल सच
पर सच को मिलने तक
सच की ज़मीन
झूठ हो जाती है
तमाम उम्र

तो क्या है सच 
ज़िन्दगी ... 
या प्राप्ति 
सच या झूठ की ...

सोमवार, 1 जून 2020

सपने आँखों में


किसी की आँखों में झाँकना
उसके दर्द को खींच निकालना नहीं होता 
ना ही होता है उसके मन की बात
लफ्ज़-दर-लफ्ज़ पढ़ना

उसकी गहरी नीली आँखों में
प्रेम ढूँढना तो बिलकुल भी नहीं होता  

हाँ ... होते हैं कुछ अधूरे सपने उन आँखों में
देखना चाहता हूँ जिन्हें
समेटना चाहता हूँ जिनको
करना चाहता हूँ दुआ जिनके पूरे होने की

सपनों का टूट जाना
ज़िन्दगी के छिज जाने से कम नहीं ...

समेटन चाहता हूँ साँस लेती पँखुरी-पँखुरी
चाहता हूँ खिल उठे जंगली गुलाब ...

#जंगली_गुलाब 

सोमवार, 25 मई 2020

क्या सच में ...


अध्-खुली नींद में रोज़ बुदबुदाता हूँ
एक तुम हो जो सुनती नहीं

हालांकि ये चाँद, सूरज ... ये भी नहीं सुनते

और हवा ...  
इसने तो जैसे “इगनोरे” करने की ठान ली है    

ठीक तुम्हारी तरह

धुंधले होते तारों के साथ
उठ जाती हो रोज मेरे पहलू से 
कितनी बार तो कहा है  
जमाने भर को रोशनी देना तुम्हारा काम नहीं

खिलता है कायनात में जगली गुलाब कहीं
उगता है रोज़ सूरज के नाम से
आकाश की बादल भरी ज़मीन पर

अरे सुनो ... कहीं तुम ही तो ...
इसलिए तो नहीं उठ जाती रोज़ मेरे पहलू से मेरे ... ?

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 18 मई 2020

किसका खेल


कितना कुछ होता रहता है

और सच तो ये भी है
कितना कुछ नहीं भी होता ...

फिर भी ...

बहुत कुछ जब नहीं हो रहा होता  
कायनात में कुछ न कुछ ज़रूर होता रहता है

जैसे ... 

मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं  

उठती हैं, मिटती हैं, फिर उठती हैं
लहरों की चाहत है पाना

प्रेम खेल रहा है मिटने मिटाने का खेल सदियों से

जालसाजी कायनात की ...
कसूर तेरी आँखों का ...
या खेल .... जंगली गुलाब का ...


#जंगली_गुलाब

सोमवार, 11 मई 2020

कृष्ण


बहाने से प्रश्न करता हूँ स्वयं से ... पर उलझ जाता हूँ अपने कर्म से ... असम्भव को सम्भव करने के प्रयास में फिर फंस जाता हूँ मोह-जाल में ... फिर सोचता हूँ, ऐसी चाह रखता ही क्यों हूँ ... चाहत का कोई तो अंत होना चाहिए ...

क्या मनुष्य
या सत्य कहूं तो ... मैं 
कभी कृष्ण बन पाऊंगा ... ? 

मोह-माया से दूर 
अपना-पराया मन से हटा 
निज से परे 
सत्य और धर्म की राह पर  
स्वयं को होम कर पाऊंगा 

क्या कृष्ण का सत्य जान जाऊंगा 
कर्म के मार्ग पर  
एक क्षण के लिए ही 
कृष्ण बन पाऊंगा ... ?

शनिवार, 2 मई 2020

चाहत या सोच की उड़ान ... ?


पूछता हूँ अपने आप से ... क्या प्रेम रहा है हर वक़्त ... या इसके आवरण के पीछे छुपी रहती है शैतानी सोच  ... अन्दर बाहर एक बने रहने का नाटक करता इंसान ... क्या थक कर अन्दर या बाहर के किसी एक सच को अंजाम दे पायेगा ... सुनो तुम अगर पढ़ रही हो तो इस बात को दिल से न लगाना ... सच तो तुम जानती ही हो ...

तुम्हें देख कर मुस्कुराता हूँ
जूड़े में पिन लगाती तुम कुछ गुनगुना रही हो

वर्तमान में रहते हुए
अदृश्य वर्तमान में उतर जाने की चाहत रोक नहीं पाता
हालांकि रखता हूँ अपना चेतन वर्तमान भी साथ

मेरे शैतान का ये सबसे अच्छा शग़ल रहा है

चेहरे पर मुस्कान लिए "स्लो मोशन" में
आ जाता हूँ तुम्हारे इतना करीब
की टकराने लगते है
तुम्हारी गर्दन के नर्म रोएं, मेरी गर्म साँसों से

ठीक उसी समय
मुन्द्वा देता हूँ नशे के आलम में डूबी तुम्हारी दो आँखें
गाढ़ देता हूँ जूड़े में लगा पिन, चुपके से तुम्हारी गर्दन में

यक-ब-यक लम्बे होते दो दांतों की तन्द्रा तोड़ कर
लौट आता हूँ वर्तमान में

मसले हुए जंगली गुलाब की गाढ़ी लाली
चिपक जाती है उँगलियों में ताज़ा खून की खुशबू लिए

मैं अब भी मुस्कुरा रहा हूँ तुम्हे देख कर
जूड़े में पिन लगाती तुम भी कुछ गुनगुना रही हो

इश ... पढ़ा तो नहीं न तुमने ...

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

दास्ताँ - हसीन सपनों की ...


इंद्र-धनुष के सात रँगों में रँग नहीं होते ... रँग सूरज की किरणों में भी नहीं होते और आकाश के नीलेपन में तो बिलकुल भी नहीं ... रँग होते हैं तो देखने वाले की आँखों में जो जागते हैं प्रेम के एहसास से ...  

दुनिया रंगीन दिखे
इसलिए तो नहीं भर लेते रँग आँखों में   

उदास रातों की कुछ उदास यादें
आँसू बन के न उतरें
तो खुद-ब-खुद रंगीन हो जाती है दुनिया

दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब हसीन लम्हों के द्रख्त
जड़ बनाने लगते हैं दिल की कोरी ज़मीन पर
क्योंकि उसके साए में उगे रंगीन सपने
जगमगाते हैं उम्र भर

सच पूछो तो दुनिया तब भी रंगीन होती है     
जब तेरे एहसास के कुछ कतरे लिए  
फूल फूल डोलती हैं तितलियाँ
ओर उनके पीछे भागते कुछ मासूम बच्चे
रँग-बिरँगे कपड़ों में

पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े 
तुम भी तो करती हो चहल-कदमी रोज़ मेरे ज़ेहन में
दुनिया इसलिए भी तो रंगीन होती है

दुनिया इसलिए भी रंगीन होती है
कि टांकती हो तुम जुड़े में जंगली गुलाब

#जंगली_गुलाब